उत्तराखंड

पाड़ को टुट्वा अर पाड़ को ठट्ठा ह्वे ये मानसून सत्र मा

सत्र अवसान से सरकार ने पगड़ी उछलने से बचायी

  पौड़ी। वाह रे, उत्तराखण्ड विधान सभा के मानसून सत्र ! मानसून की तरह दनदनाते हुए जिस स्पीड से आया उससे दुगनी स्पीड़ से वापस भी चला गया । पहाड़ के लोग जब तक पलक पांवडे बिछाये स्वागत की तैयारी कर रहे थे तब तक पता चला कि बादल बरसे कम पर बिजली गिरा के वापस चले भी गये । पहाड़ अपने माननीयों के छोड़े गये जूठे पत्तल उठाता नजर आया ।

अब मानसून को भी बदनाम क्यों किया जाय । मानसून तो आजकल कई दिनो तक सक्रिय हो बरसते रहते हैं। परन्तु यह तो सरकारी मानसून है जनाब, कब आये, कब चला जाय सरकार के अलावा यह किसे पता रहता है? वह तो धन्य हो इन कांग्रेस वालों का, इन्होंने पहले नहीं बताया कि रात को वे विधान भवन के अन्दर आरामदायक गद्दों में सोयेंगे अन्यथा हो सकता था कि सरकार बहादुर रात ही न आने देती । तब अगले दिन का इन्तजार ही क्यों होता । हमारे पहाड़ के विधायक तो उसी दिन देर शाम तक अपने घर में थकान मिटाते होते ।

तो क्या सचमुच हमारी सरकार और तमाम माननीय गैरसैंण में इतने थक जाते होंगे कि तीन घण्टे तक सदन की कार्यवाही गतिमान नहीं रह पाती। आजकल तो तीन घण्टे फिल्म भी छोटी लगती है देखने के लिये लेकिन यहाँ तो विधान सभा के भीतर सदन की कार्यवाही का ट्रेलर दिखाया गया और हो गया । बताते हैं कि इनमें कई विधायक गण तो अब बैठेंगे के चक्कर में आधा – पौन घण्टे भी भीतर नहीं बैठ पाये । अब उन्हें भी क्या पता कि बारात की विदाई इतने जल्दी होगी । तय तो अगर दिन ही दिन गिने तो चार दिन यानी कि 48 घण्टे हुआ था । अब 48 घण्टे से वह 2 घण्टे 40 मिनट पर आ गये तो बेचारे करते भी क्या । बिस्तर खुले और समेट दिये गये । अटैचियों से माननीयों का पूरा सामान भी बाहर नहीं निकला । अफसरों ने भी सोचा कि चलो छुटकारा मिला ।

सरकार और माननीयों ने सोचा ‘ चलो, निपट गया ।’ इससे क्या फर्क पड़ता है कि सबसे कम वक्त विधानसभा चलने का रिकॉर्ड बन रहा हो। अब पहाड़ वाले जो सोचें, सोचते रहें। उनके सोचते न सोचने से क्या फर्क पड़ता है ? सरकार विरोध से बच गयी। विपक्षियों के विरोध से, सड़को पर जनता के विरोध से, मीडिया की अनाप शनाप की खबरों से । मन्त्रीगण जबाब देने से बच गये । सरकार आपदा और कानून व्यवस्था व इसी तरह अन्य मुद्दों पर असहज होने से बच गयी। नये नवेले संसदीय मंत्री की फजीहत होने से बच गयी। सचिव /अफसर काम के बोझ से बच गये । सबसे बड़ी बात विधानसभा अध्यक्ष पिछली बार की तरह किसी खामखां के बखेडे से बच गयी । अब यूँ कहें कि विधान सभा की कार्यवाही चन्द भी क्या, दो – ढाई घण्टे में समेट कर पूरी सरकार ने अपनी इज्जत बचा दी। इसमें अतिशयोक्ति भी नहीं। यह तो सरकार का हुनर है सहाब । काम भी निपटा दिये और पगड़ी उछलने से भी बच गयी।

चलो, सरकार बहादुर का तो हो गया। महीनो की छुट्टी हो गयी। अगली बार क्या होता है, कहाँ होता है ? देखा जायेगा । परन्तु पहाड़ का क्या? पहाड़ की जनता का क्या? यहाँ की जनभावनाओं का क्या? यहाँ के     दु :ख तफलीकों का क्या? यहाँ की आपदा का क्या? कानून व्यवस्था के हो रहे मजाक का क्या?

पहाड़ में आये थे तो पहाड़ की समस्याओं और उनके निराकरण पर चर्चा होती तो पहाड़ी साकार के शुक्रगुजार होते । अनुपूरक बजट व कुछ विधेयक तो देहरादून मे भी एक दिन सत्र बुलाकर निपटाये जा सकते थे। फिर इतनी भागमभाग क्यों? करोड़ो का खर्चा व तामझाम क्यो? असल में हमारे ये राष्ट्रीय दल शुरू से ही पहाड़ के भीतर राजधानी चाहते ही नहीं हैं। पहाड़ तो इनके लिये केवल सैर सपाटे और मौज मस्ती के लिये हैं। आपदा के समय आँसू बहाने के लिये हैं। इन्हें जीने और भोगने के लिये नहीं हैं। इसलिये तो पहाड़ से जीतकर जो मन्त्री और बड़े नेता बन रहे हैं, वे भी पलटकर पहाड़ में नहीं आता चाहते । अब हमारे ये नेता भी तो चुनाव में मैदानी सीट ढूढ़ने लगते हैं। यही कारण भी है कि ये नेता परिसीमन में पहाड़ पर ध्यान नहीं देते । इनका जोर भी मैदानी क्षेत्रों में सीटों को बढ़ाना लगता है।

सवाल कई हैं। सवाल यह भी है कि जब हमारे प्रतिनिधियों को विधान सभा मे अपनी क्षेत्र की समस्याओं पर बोलते का मौका ही नहीं मिलना है तो काहे के प्रतिनिधि ? किस फोरम पर निराकरण के लिये ये अपनी बातें रखेंगे। और यदि इन्हे विधानसभा में बोलने का समय नहीं तो काहे के विधायक ? क्यों फूक रही है सरकार इनके वेतन भत्तों पर पब्लिक का करोड़ो रुपया । इन सब को आजाद करें और मनमाफिक सरकार चलायें । तब रोक टोक भी नहीं होगी और सरकार को कटघरे में खड़े करने वाले भी नहीं रहेंगे।

अब सवाल यह भी उठता है कि इस डेढ दिनी सत्र के अवसान के लिये कौन जिम्मेदार है? उत्तरांचल विधानसभा प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावली 2005 के अध्याय 16 (ख) व कार्य मन्त्रणा समिति के नियम 217 में ‘समय के बंटवारे में परिवर्तन ‘ में यह स्पष्ट किया गया है कि ‘सदन द्वारा विनिश्चित समय सूची में कोई परिवर्तन नहीं किया जायेगा, जब तक कि सदन नेता द्वारा प्रार्थना न की जाय और उस दशा में यह मौखिक रूप से सदन को अधिसूचित करेंगे कि ऐसे परिवर्तन के लिये सामान्य सहमति है और अध्यक्ष सदन का अभिप्राय जानकर उस परिवर्तन को प्रवर्तित करेंगे । ‘ इस नियम में सदन के नेता जो माननीय मुख्यमंत्री जी होते हैं द्वारा क्या सदन की सामान्य सहमति से ही ऐसा किया गया होगा। और क्या मा० अध्यक्ष द्वारा सदन का अभिप्राय जानकर ही सदन का अवसान किया गया होगा ? परन्तु सवाल यह भी है कि यदि ऐसा सदन की सहमति से हुआ है तो नेता विपक्ष यशपाल आर्य व पूर्व स्वीकर प्रीतम सिंह कार्य मन्त्रणा समिति के सदस्य पद से इस्तीफा ही क्यों देते ?

अब समझने के लिये पहाड़ की जनता के पास कुछ रह नहीं गया । इसलिये गढ़वाल में तो लोग यही कह रहे हैं कि ‘ह्वे तब । पहाड़ का वास्ता त् बल ,’तिमला तिमला s खतेनी अर नग्या नंगी दिखेनी ।’

 

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