अदालत के फैसले पर ही सही : देर आये दुरस्त आये सरकार
2018 तक 10 साल की सेवा करने वाले संविदा कार्मिकों का स्थायीकरण

देहरादून में उपनल कर्मियों का धरना – प्रदर्शन
पौड़ी : दिनांक 15 नवम्बर, 2025
हाई कोर्ट के आदेश के बाद ही सही पर आखिर कुंभकर्णी नींद में सोयी हमारी सरकार को संविदा, नियत वेतन, तदर्थ, दैनिक वेतन, कार्य प्रभावित और अंशकालिक कार्मिकों का भला करने की याद आ ही गयी। देर से ही सही लेकिन एक उम्मीद जागी है, आश बंधी है कि शायद आने वाले समय में हमारे प्रदेश के इन सर्वाधिक शोषित युवाओं का भला हो जायेगा । अगर ऐसा होता है तो सरकार का यह ऐतिहासिक फैसला होगा और निश्चित रूप से इसकी सराहना भी करनी होगी।
प्रदेश सरकार ने 2024 के हाईकोर्ट के आदेश को ध्यान में रखते हुए उन सभी कार्मिकों को स्थायी करने का निर्णय लिया है जो विभिन्न विभागों में संविदा, तदर्थ या दैनिक वेतन पर नियमित ही काम कर रहे थे और जो वर्ष 2018 तक 10 वर्ष की सेवा पूर्ण कर चुके थे। धामी सरकार ने इस फैसले की कैबिनेट में मंजूर दी है। सरकार को चाहिए कि इन शोषित युवाओं के भविष्य को देखते हुए वह कट ऑफ वर्ष 2018 ही न रखे बल्कि अब तक जो लम्बे समय से कार्य कर रहे हैं उन सभी को विनियमित कर दे।
बताया जा रहा है कि इस निर्णय (2018 तक के संविदा व अन्य कार्मिक) से प्रदेश में सात हजार से ज्यादा कर्मचारियों को नियमित सेवा का लाभ मिलेगा और उनकी नौकरी की अनिश्चितता खत्म होगी। बताते चलें कि प्रदेश में संविदा, तदर्थ व अन्य इसी तरह के कर्मचारी काफी लंबे समय से नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं । इनके अतिरिक्त सरकार ने उपनल कर्मचारी को नियमित करने और न्यूनतम वेतन और महंगाई भत्ते के लिए मंत्रिमंडल की उप समिति का गठन किए जाने का निर्णय लिया है जो दो महीने में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।
पहले सरकारी नियमावली में इस तरह के कार्मिकों को पांच साल की सेवा के बाद नियमितीकरण का प्रावधान था। लेकिन सरकार को इस नियमावली की कभी याद ही नहीं रहीं । विभिन्न विभागों में वर्षों से संविदा, दैनिक वेतनभोगी, तदर्थ, कार्य प्रभावित और अंशकालिक कर्मी काम करते रहे हैं लेकिन सरकार ने कभी भी इनकी सुध नहीं ली। इस तरह काम करते हुए प्रदेश के इन युवाओं ने अपनी पूरी जवानी विभाग और सरकार को समर्पित कर दी लेकिन फिर भी सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं गया। उपनल को गठित हुए दो दशक से अधिक समय हो गया, गेस्ट टीचर और विभिन्न विभागों में संविदा और अंशकालिक कार्मिक लम्बे समय से स्थाई कार्मिकों की तरह बेहतर काम कर रहे हैं लेकिन सरकार ने उनकी कभी नहीं सुनी । वह तो भला हो उच्च न्यायालय का जिसके फैसले के बाद सरकार को जागना पड़ा है। उपनल कर्मी तो फिर भी संगठित होकर अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन संविदा कर्मी व अन्य तरह के कार्मिक जो वर्षों से काम कर रहे हैं वे तो संगठित भी नहीं। अब इस फैसले के बाद उम्मीद जागी है कि उनका भी भला हो जायेगा ।
केंद्र में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के दौरान सरकार ने अपने राजस्व को बचाने के लिये संविदा पर कार्मिकों को रखने का फैसला लिया था। तभी से पूरे देश में संविदा कार्मिकों का प्रचलन बढ़ गया था । आज स्थिति यह हो गयी है कि पूरे देश में विभिन्न प्रान्तों की सरकारें संविदा कार्मिकों के भरोसे चल रही हैं और ऐसे कार्मिकों का सरकार जबरदस्त शोषण कर रही है। उत्तराखण्ड सरकार भी विगत 25 वर्षो से हजारों की तादात में लगे ऐसे कार्मिकों के भरोसे काम कर रही है। नियमावली भले ही यह कहती हो कि इन्हें पांच साल मै विनियमित करना है लेकिन सरकार ने सदैव नियमावली की अनदेखी की और वह इन कार्मिकों का खून चूसती रही।
मजेदार बात यह है कि प्रदेश में एक ही तरह के संविदा कर्मी नहीं हैं। सरकार ने जब देखा कि संविदा पर लगे कार्मिको का देर सबेर स्थायी करना ही पड़ेगा तो उसने इसका तोड़ खोज दिया। संविदा पर नियुक्ति न देने का आदेश जारी कर सरकार ने पिछले कुछ सालों से आउटसोर्स से भर्तियां करना शुरू कर दिया। इससे सरकार ने युवाओं को एक नये शोषण के जाल मै फंसा दिया है। सरकार अपनी जबाबदेही से तो मुक्त हो गयी लेकिन उसने प्रदेश के ऐसे हजारों युवाओं को शोषण के कभी न खत्म होने वाले जाल में फंसा दिया है। आउटसोर्स कम्पनी नियुक्ति से समय भी दलाली खाकर चांदी काट रही है और फिर प्रतिमाह उनके वेतन में भी कटौती कर रही है। अधिकांश प्रदेश से बाहर की इन आउटसोर्स कम्पनियों की नेताओं और अधिकारियों से गठजोड़ है और इन्हें मोटी रकम भेंटकर ही यह प्रदेश में अपना कारोबार चला रही हैं।
पिछले दिनों एक ऐसी ही आउटसोर्स कम्पनी से नियुक्ति में दलाली का एक जबरदस्ती ऑडियो वायरल हुआ था जिसमें नियुक्ति के एवज में उस महिला अभ्यर्थी से 80 हजार रु० देने की बात हो रही थी। अभी शिक्षा मन्त्री पिछले लम्बे समय से सरकारी विद्यालयों में चतुर्थश्रेणी कार्मिकों को आउटसोर्स से नियुक्ति देने की बाते करते आ रहे हैं लेकिन शायद आउटसोर्स कम्पनी तय न होने के कारण यह प्रकरण अभी रुका है।
किसी भी लोकहितकारी सरकार को अपने प्रदेश के युवाओं का भविष्य इस तरह चौपट नहीं करना चाहिए । सरकार को चाहिए कि वह उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन करते हुए प्रदेश में एक ऐसी व्यवस्था बनाये जिससे यदि किसी मजबूरी में सरकार को ऐसे कार्मिकों को नियुक्त करना पड़े तो यक्षाशीघ्र उनके विनियमिती का प्राविधान भी हो। ऐसा न हो कि गेस्ट टीजर और अन्य तरह के संविदा कर्मियों की तरह सरकार इनका शोषण करती रहे और ये युवा इस तरह की नौकरियाँ करते हुए बिना नियमितीकरण के बूढ़े हो जांय ।
उपनल कर्मचारियों के लिए उप समिति बनेगी
सरकार ने उपनल कर्मचारियों के मुद्दों को गंभीरता से लेते हुए मंत्रिमंडल की एक उप समिति गठित करने का भी निर्णय लिया है। यह समिति उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण न्यूनतम वेतन महंगाई भत्ते और बाकी जरूरी बिंदुओं पर अध्ययन कर दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देगी। समिति हितधारकों से बातचीत कर भविष्य की कट ऑफ डेट भी तय करेगी ताकि आगे किसी तरह का विवाद न हो।
कैबिनेट ने उपनल व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए उसके मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन और आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन में जरूरी संशोधन को मंजूरी दी है। इन बदलावों के बाद पूर्व सैनिक उनके आश्रितों और अन्य योग्य लोगों को उपनल के माध्यम से विदेशों में भी रोजगार मिलने का अवसर मिलेगा। सरकार का कहना है कि यह कदम रोजगार के नए रास्ते खोलेगा और उपनल को एक व्यापक और आधुनिक प्लेटफॉर्म बनाएगा।
सरकार ने भले ही उपनल कार्मिकों के स्थायीकरण हेतु कैबिनेट की एक उपसमिति का गठन कर दिया हो लेकिन उपनल कर्मी अभी भी अपनी मांगों को लेकर राजधानी में आन्दोलनरत हैं । उनका आरोप है कि उप समिति का गठन कर सरकार उन्हे बरगलाने का काम कर रही है । उनका कहना है कि अब तक 7 कमेटियों का गठित हो चुका है लेकिन नतीजा सिफर है। सरकार को मा० न्यायालय में जबाब देना है इसलिये समय बढ़ाने के लिये कमेटी गठित की गयी है। उनका कहना है कि हाईकोर्ट से 2018 मे और सुप्रीम कोर्ट से 2024 में उनके पक्ष में स्पष्ट निर्णय दिया है फिर भी सरकार इस मामले को लटकाए हुए है। इधर, सरकार का कहना है कि इसमें कई हितधारक हैं और मामला पेचीदा है इसलिये इसे सुलझाने मैं समय लग रहा है। आंदोलन कर रहे उपनल कर्मियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगे पूरी नहीं होती आन्दोलन जारी रहेगा।
= बिमल नेगी



