पौड़ी। दिनांक 20 नवम्बर, 2025
सरकार के तमाम दावों के बाद भी प्रदेश में बेरोजगारी की दर में बढ़ोतरी हो रही है। कम से कम सरकारी आंकड़े तो इसी बात की ओर इशारा कर रहे हैं। यह बात तब है जब अभी कुछ महीने पहले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रदेश में बेरोजगारी दर में 4.4 प्रतिशत कमी आते की जानकारी दी थी।
उत्तराखण्ड आज पूरे देश के अन्य प्रान्तों के मुकाबले सर्वाधिक बेरोजगारी से जूझ रहा है। इस बात की तस्दीक भारत सरकार का सांख्यकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मन्त्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation) (MoSPI) की पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे की रिपोर्ट कर रही है। मंत्रालय तिमाही रिपोर्ट को भारत सरकार के प्रेस इन्फार्मेसन ब्यरो (PIB) Delhi ने पिछले दिनों 10 नवम्बर, 2025 को जारी की है। इसमें जिन प्रदेशों की बेरोजगारी दर प्रदर्शित की गयी है उनमें उत्तराखण्ड नम्बर -1 पर है। इस बुलेटिन में उत्तराखण्ड की बेरोजगारी दर (जुलाई से सितम्बर -2025) 8.9 प्रतिशत प्रदर्शित की गयी है जो अन्य प्रदेशों से सर्वाधिक है। यही नहीं प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर बढ़कर लगभग दस प्रतिशत है। देश की औसत राष्ट्रीय दर 5.2 है और इसमें उत्तराखण्ड की दर राष्ट्रीय औसत से से भी 3.7 प्रतिशत अधिक है। इसमें दूसरे नम्बर पर 8.2 प्रतिशत के साथ आन्ध्र प्रदेश तथा 8 प्रतिशत की दर के साथ केरला तीसरे नम्बर पर रहा है। गुजरात में बेरोजगारी दर सर्वाधिक कम 2.2 प्रतिशत है।

उत्तराखण्ड में यह राष्ट्रीय औसत बेरोजगारी दर अन्य प्रान्तों से तब अधिक है जब मई माह में प्रदेश में योजना आयोग के सदस्यो के साथ बैठक में मुख्यमन्त्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश में बेरोजगारी दर में 4.4 की कमी आते की घोषणा की थी। मई में उनके द्वारा प्रदेश में बेरोज़गारी दर में कमी आने और कुछ ही महीने बाद यह दर पूरे देश में सर्वाधिक होने की बात गले नहीं उतरती। मुख्यमन्त्री ने उसी समय प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय में 11. 33 प्रतिशत की वृद्धि होने की जानकारी भी दी थी तो क्या मुख्यमन्त्री की इस जानकारी पर सवाल उठाये जांय। कम से कम योजना आयोग की बैठक में रखी गयी उनकी बात को तो हम गलत नहीं कह सकते ।
बेरोजगारी तो पूरे देश में है लेकिन पूरे देश की औसत दर से उत्तराखण्ड में बेरोजगारी दर अधिक होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इससे सरकार की रोजगार नीति पर भी सवाल खड़े होते हैं। प्रदेश सरकार लगातार दावा करती है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के 4 जुलाई 2021 को कार्यभार संभालने के बाद उनके नेतृत्व में पिछले चार वर्षों में 26,000 से अधिक सरकारी नौकरियां दी गई हैं। सरकार का लक्ष्य बताता है कि 2025 तक सरकार द्वारा प्रदेश में यह संख्या बढ़ाकर 36000 कर दी जायेगी। सरकार का दावा है कि उसने पिछली सरकारों की तुलना में अधिक नौकरियां दी हैं।
अब प्रदेश सरकार जो भी दावे करे लेकिन इन दावों की जमीनी हकीकत प्रदेश के बेरोजगारी आंकड़े देखने से सामने आ जाती है। सरकारी आंकड़े ही गवाह हैं कि जनवरी 2024 तक, उत्तराखंड में 8,83,346 पंजीकृत बेरोजगार थे। ये आंकड़े सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकृत हैं, हालॉकि रोजगार से आशय केवल सरकारी रोजगार ही नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त होने वाले रोजगार से भी है लेकिन केंद्र सरकार की पी० एल० एस० एफ० की रिपोर्ट स्वयं इस को तस्दीक कर रही है कि सरकार के तमाम प्रयासों के बाद भी बेरोजगारी दर बढ़ी ही नहीं है बल्कि पूरे देश में आज सर्वाधिक है।
प्रदेश में विपक्ष भले ही गाहे-बगाहे ही बेरोजगारी की बात उठा रहा हो लेकिन बेरोजगारों का गुस्सा तो प्रायः सड़कों पर सरकार को भी साफ दिखायी दे रहा है। सभी जानते है कि सरकारी नौकरियां तो सीमित है । सभी को नहीं मिल सकती । लेकिन रोजगार के अन्य अवसर तो पैदा किये जा सकते हैं। सरकार प्रवासी उत्तराखण्डी और अन्य उद्योगपतियों से प्रदेश मे निवेश कर रोजगार सृजन के अवसर बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है और स्वयं ही इस बात की घोषणा भी कर रही है कि अब तक एक लाख करोड़ रुपये के निवेश की ग्राउन्डिग भी कर दी गयी है लेकिन क्या इस निवेश के जरिये उत्तराखण्ड के बेरोजगारों का भी भला हुआ है? हरीश रावत सरकार के समय बाहर से आने वाले उद्योगों में 75 प्रतिशत उत्तराखण्ड के लोगों को रोजगार देने का प्राविधान किया गया था लेकिन आज उसकी कहीं बात नहीं हो रही है। जो निवेश धरातल पर उतर रहा है उसमें यहां के बेरोजगारों को कितना लाभ मिला है इसकी जानकारी सरकार भी सार्वजनिक नहीं कर रही है।
प्रदेश में पलायन का एक बड़ा कारण रोजगार ही है। अगर युवाओं को अपने घर के निकट ही गुजारे लायक रोजगार भी मिल जाय तो वह पलायन नहीं करेगा। हमारे पहाड़ के गाँव खाली होने से बच जायेंगे । उत्तराखण्ड बनने के बाद प्रदेश में हरिद्वार, देहरादून, उद्यमसिंह नगर और नैनीताल जिलों का ही सर्वाधिक विकास हुआ है। और यह सब सरकार की गलत व भेदभाव परक नीतियों के कारण हो रहा है। पहाड़ से युवाओं का सर्वाधिक पलायन इन्ही जनपदों के मैदानी क्षेत्रों मै हुआ है। सिडकुल या अन्य माध्यमों से उद्योगों को जमीने देकर इन्हीं मैदानी क्षेत्रों को आबाद किया जा रहा है।
माना पहाड़ पर बहुत भारी भरकम उद्योग नहीं लग सकते लेकिन ऐसे उद्योगों के लिये भी सरकार ने कभी पहल नहीं की जिनके लिये कच्चा माल पहाड़ के अन्दर बहुतायत में है। पेयजल का व्यापार केवल उत्तराखण्ड में ही करोड़ों में है लेकिन सरकार ने कभी ऐसे उद्योगों को प्रोत्साहित नहीं किया जिससे उत्तराखण्ङ की सदानीरा पवित्र नदियों के पानी की ब्राडिंग से रोजगार पैदा किये जा सके। कागज की फैक्टरियाँ जैसे लालकुंआ, काशीपुर और हरिद्वार आदि स्थानों पर हैं वैसी क्या गढ़वाल में नहीं लग सकती। जंगलों से मिलने वाले अन्य रॉ मैटीरियल आधारित फैक्ट्रियां भी तो लग सकती हैं। दियासलाई से लेकर आयुर्वेदिक दवाईयाँ बनाने की इकाईयाँ भी स्थापित हो सकती हैं। पहाड़ केवल गुलदारों के प्रजनन या उनके पोषण के लिये ही तो नहीं हैं। लेकिन सरकारी रवैये और नीतियों से तो यही लग रहा है कि पहाड़ और खासकर गढ़वाल के जंगल तो सरकार के लिये भालू, गुलदार आदि जंगली जानवरों की बसावट के लिये ही बने हैं। भारी भरकम उद्योग न सही नैनो मैटीरियल वाले उद्योग तो यहाँ लगी सकते हैं। एक बार सरकार सोचे तो सही ।
आज भी सरकार पहाड़ो के मामले में उत्तर प्रदेश की नीतियो पर चल रही है। गढ़वाल के अन्दर ठेठ पहाड़ में आज भी एक ऐसा उद्योग स्थापित नहीं हो पाया जहां दो चार सौ लोगों को रोजगार मिला हो। हमने उत्तराखण्ड बना दिया। रजत जयन्ती भी मना दी लेकिन रोजगार के मामले में वही ढाक के तीन पात। हमारे युवा आज भी हरिद्वार, काशीपुर में 10 -15 हजार रु० की नौकरी के लिये अभिशप्त हैं। आखिर सरकार कब सोचना शुरू करेगी ? गाँव तो सत्तर फीसदी खाली हो गये। जब सभी खाली हो जायेंगे तब सोचने से क्या फायदा।
फैक्टरियों और रोजगार इकाईयों की बात तो दूर सरकार आज भी पहाड़ में केवल मूलभूत सुविधाओं जुटाने में मशगूल है और वह भी आधी – अधूरी। अभी भी लोग इन सुविधाओं के लिये आन्दोलरत हैं। पहाड़ में जो कुछ बागवानी, मत्स्य पालन, मुर्गीपालत, मौन पालन, दुग्छ उत्पादन, सब्जी उत्पादन, कृषि या अन्य क्षेत्रों में थोड़ा बहुत काम हो रहा है वह सरकारी नीतियों से उतना नहीं जितना उनके निजी संकल्प और पुरषार्थ से हो रहा है। हाँ, इतना जरूर हुआ है कि सरकार ने अपने वोट बैंक को साधने के लिये स्वयं सहायता समूह को बेहतर ढंग से सक्रिय किया है। हर सरकारी कार्यक्रमों में, वीआईपी व मन्त्रियों के कार्यक्रमों में प्रायः इनकी आमद तो यही साबित करती है कि इनको रोजगार के लिये कम ऐसी सेवाओं के लिये ज्यादा तैयार किया गया है।
पहाड़ी गाँवों में एक जमाने में फौज की नौकरी को सर्वाधिक सुलभ, आकर्षक और विश्वसनीय माना जाता था लेकिन आज पहाड़ी लोगों का दुर्भाग्य है कि अग्निवीर योजना आने से यहाँ युवाओं को फौजी बनने के सपने से महरूम होना पड़ रहा है। अग्निवीर योजना के जो भी गुण दोष हों हम उसकी बात न कर इससे पूर्व में मिलने वाले स्थाई रोजगार की बात कर रहे हैं। सरकारी संविदा की नौकरी भी जुगाड़ वालों, सरकार / विभाग तक पहुँच रखने वाले लोगों तक सीमित हैं, ऐसे हालात में पहाड़ के गरीब लोगों के लिये विकल्प छोटी मोटी नौकरी के लिये पलायन के अलावा और कुछ नहीं है। हमारी मानसिकता भी रोजगार न मिलने में प्रायः आड़े आ जाती है। बाहरी लोग यहाँ आकर तमाम तरह के रोजगार कर रहे हैं लेकिन हमारी मानसिकता ऐसे रोजगारों के प्रति प्रायः हमें उदासीन रखती है।
देहरादून में बैठकर पहाड़ में राज करना और पहाड़ के अन्दर राजधानी बनने पर सरकार चलाने में बुनियादी अन्तर है। जब तक उच्च अधिकारियों /नौकारशाहों को पहाड़ की समझ नहीं है तब तक वे हमारे कम अक्ल नेताओं को पहाड़ के बारे में बेवकूफ बनाते रहेंगे और इन नेताओं की बेवकूफी हम पर हमेशा भारी पड़ती रहेगी। तब तक पहाड़ ऐसे ही लुटते – पिटते और केवल शोषित होने के लिये अभिशप्त रहेंगे। तब तक विधानसभा के अन्दर पहाड़ की पीड़ा बयान करने पर कोई अध्यक्ष उसे धमकाते हुए बैठता रहेगा और बाकी हमारे सभी मन्त्री विधायक चुपचाप देखते रहेंगे। नये परिसीमन के बाद आने वाला समय तो और भी डरावना होने वाला है। इसलिये तो चकड़ेत नेता भी पहाड़ से ही नहीं पहाड़ी सीट से भी पलायन कर अपने लिये मैदानी क्षेत्रों में सुरक्षित सीट का जुगाड़ लगाये हुए हैं।
= बिमल नेगी



