उत्तराखंड

जिन्दगी के फील्ड को अलविदा कह गये यूकेड़ी के फील्ड मार्शल

हरिद्वार के खड़खड़ी घाट पर दी जायेगी दिवाकर भट्ट को कल अन्तिम विदाई

पौड़ी : दिनांक 25 नवम्बर, 2025

उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के सूत्रधार, पूर्व कैबिनेट मन्त्री, उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के पूर्व अध्यक्ष और फील्ड मार्शल की उपाधि प्राप्त दिवाकर भट्ट का आज दोपहर निधन हो गया । वे 79 वर्ष के थे। उनके बेटे ललित भट्ट ने उनके निधन की पुष्टि की है। उनको बुधवार को सम्मान के साथ खड़खड़ी शमशान घाट पर अंतिम विदाई दी जाएगी।

जानकारी के अनुसार, दिवाकर भट्ट की तबीयत लंबे समय से खराब चल रही थी। हालत बिगड़ने पर उन्हें देहरादून ले जाया गया था, जहां कुछ दिनों के इलाज के बाद भी उनके स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ । परिजनों के अनुसार, डॉक्टरों के मना किए जाने के बाद मंगलवार दोपहर में उन्हें देहरादून से हरिद्वार लाया गया लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ और दोपहर बाद उन्होंने अंतिम सांस ली।

उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिवाकर भट्ट सत्तर के दशक से ही सक्रिय रहे । वह 19 वर्ष की बहुत छोटी उम्र में आंदोलनों में शामिल होने लगे थे। 1972 में सांसद त्रेपन सिंह नेगी के नेतृत्व में दिल्ली में हुई रैली में वह शामिल हुए। वर्ष 1977 में वह ‘उत्तराखंड युवा मोर्चा’ के अध्यक्ष रहे। जब 1978 में त्रेपन सिंह नेगी और प्रताप सिंह नेगी के नेतृत्व में दिल्ली के बोट क्लब पर रैली हुई तो दिवाकर भट्ट उन युवाओं में शामिल थे, जिन्होंने बद्रीनाथ से दिल्ली तक पैदल यात्रा की थी। इसमें आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी हुई और तिहाड़ जेल में रहना पड़ा।

दिवाकर भट्ट जी ने अपनी आईटीआई की पढ़ाई के बाद हरिद्वार के बीएचईएल में कर्मचारी नेता के रूप में अपनी विशेष जगह बनाई। उन्होंने 1970 में ‘तरुण हिमालय ‘ नाम से संस्था बनाई इसके माध्यम से रामलीला जैसे सांस्कृतिक और एक स्कूल की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र मे भी काम किया। दिवाकर भट्ट ने 1971 में चले गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन में भी भागीदारी की। 

दिवाकर भट्ट जी 1979 में ‘उत्तराखंड क्रांति दल’ के संस्थापकों में से हैं। उन्हें पार्टी का संस्थापक उपाध्यक्ष बनाया गया था। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के तो वे संयोजक, रणनीति एवं सूत्रधार रहे।  उक्रांद के नेतृत्व में कुमाऊं-गढवाल मंडलों का घेराव, दिल्ली में 1987 की ऐतिहासिक रैली, समय-समय पर किए उत्तराखंड बंद में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। 1988 में वन अधिनियम के चलते रुके विकास कार्यों को पूरा करने के लिए बड़ा आंदोलन हुआ, जिसमें भट्ट जी की गिरफ्तारी हुई। जब 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन की ज्वाला भड़की तो दिवाकर इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक थे। जब 1994 के बाद आंदोलन ढीला पड़ा तो उन्होंने नवंबर, 1995 में श्रीयंत्र टापू और दिसंबर, 1995 में खैट पर्वत पर अपना आमरण अनशन किया। 

राजनीति में सक्रिय रहते हुए वह 1982 से लेकर 1996 तक तीन बार कीर्तिनगर के ब्लाक प्रमुख रहे। उन्होंने जितने भी विधानसभा चुनाव लडे उनमें उन्हें हमेशा भारी वोट मिला। वर्ष 2007 में विधायक और मंत्री भी बने। अपने क्षेत्र में आज भी उनकी गहरी पकड़ है। दिवाकर भट्ट 1999 और 2017 में उक्रांद के केंद्रीय अध्यक्ष रहे।

दिवाकर भट्ट का निधन उत्तराखण्ड क्रान्तिदल के साथ ही उत्तराखण्ड के लिये अपूरणीय क्षति है। हलाँकि पिछले कुछ समय से वे अस्वस्थ ते लेकिन पार्टी को समय – समय पर उनका मार्गदर्शन मिल रहा था। हालांकि कई लोगों का यह भी मानना है कि वे पारटी की भीतर गर्मदल के नेता थे तथा कई पार्टी नेताओं के साथ उनके मतभेद सदैव मुखर रहे। इसके चलते पार्टी कई बार टूटी और पुनः एक हुई। कई लोगों का यह भी कहना है कि यदि कैबिनेट मन्त्री रहते वे यूकेडी का सही ढंग से पोषण करते तो आज उक्राँद एक सशक्त क्षेत्रीय दल के रूप में अपनी पहचाना बना चुका होता ।

आज उनके निधन पर पूरा पहाड़ शोक सन्तप्त है । दिवाकर भट्ट जीवन भर पहाड़ के लिये संघर्ष करते रहे। उन्होंने पहाड़ की पीड़ा का भोगा और सदैव संघर्षरत रहकर उसे स्वर देने की कोशिश की। पहाड़ और उत्तराखण्ड राज्य के लिये उनके योगदान को सदैव याद रखा जायेगा । प्रदेशवासियों की ओर से ऐसे जननेता को हार्दिक श्रद्धांजलि।

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