उत्तराखंड

स्थाई रिक्त पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू न करने पर अदालत ने सरकार से जबाब मांगा

स्वीकृत व रिक्त पदों का ब्यौरा संकलित कर हलफनामा दायर करने के निर्देश

पौड़ी। 16 जनवरी, 2026

उच्च न्यायालय की एकल खण्डपीठ ने अपने एक फैसले में प्रदेश सरकार को सभी विभागों में रिक्त व स्वीकृत पदो का ब्यौरा संकलित करने और इस सम्बन्ध में एक हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिये हैं। पीठ ने स्वीकृत पदों के भरने के बजाय सरकार की आउटसोर्सिंग भर्ती पर बढ़ती निर्भरता पर नाखुशी जाहिर की है।

न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने मुख्य सचिव को उक्त निर्देश जारी किये। उन्होंने मुख्य सचिव को सभी विभागों में सभी स्वीकृत रिक्तियों पर डेटा संकलित करने और एक हलफनामा दायर कर उसमें यह स्पष्ट करने के निर्देश दिये कि नियमित व स्थाई रिक्त पदों के खाली रहने के बाद भी इन पदों पर भर्ती क्यों नहीं की जा रही है। इसके बजाय इन पदो पर तदर्थ अस्थाई, आउटसोर्स या दैनिक वेतन पर भर्त्ती क्यों की जा रही है। उन्होंने ऐसे पदों पर कार्य करते बेरोजागारों के ओवरऐज होने पर गहरी चिन्ता व्यक्त की है। 

अदालत ने उक्त आदेश पौड़ी गढ़वाल जिले के चैड चैनपुर स्थित जनता इन्टर कॉलेज की प्रबन्ध समिति द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान दिये। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि स्वीकृत स्थायी पदों को नियमित नियुक्तियों के माध्यम से भरने के बजाय, राज्य आउटसोर्सिंग, ठेकेदारों और अस्थायी व्यवस्थाओं का सहारा ले रहा है। यह तर्क दिया गया कि यह प्रथा “शोषणकारी, मनमानी और अनुचित है तथा संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 का उल्लंघन है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि कई मामलों में, स्थायी और स्वीकृत रिक्तियों की उपलब्धता के बावजूद, राज्य नियमित भर्ती शुरू करने में विफल रहा है। यदि रिक्तियां स्वीकृत हैं और उपलब्ध हैं, तो अधिकारी भर्ती प्रक्रिया को आगे क्यों नहीं बढ़ रहे हैं।

अदालत ने इस बात पर चिन्ता व्यक्त की कि कई योग्य युवा लोग नियमित नियुक्तियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं जबकि रिक्तियां अभी भी खाली हैं। अदालत ने कहा कि रिक्तियां मौजूद हैं और प्रतिवादी नियमित भर्ती प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं, जो राज्य प्राधिकारियों की ओर से गंभीर निष्क्रियता प्रतीत होती है। इस मामले को 16 फरवरी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

पीठ ने राज्य से यह स्पष्टीकरण भी मांगा कि चतुर्थ श्रेणी के पदों को “मरते हुए कैडर” की घोषणा क्यों की गई। अदालत को बताया गया कि यह निर्णय यूपी सरकार की नीति को अपनाकर लिया गया था, जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रवींद्रसिंह एवं अन्य बनाम यूपी एवं अन्य राज्य (2013) मामले में नीति को “अधिकार से परे” बताते हुए उसे अनुच्छेद 14, 16 और 19 का उल्लंघन बताया है।

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