तो क्या पुनर्विचार याचिकाएं दायर कर सरकार नहीं चाहती थी कि उपनल कर्मियों का भला हो…
सरकार द्वारा दायर सभी पुनर्विचार याचिकाएं खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने उपनल कर्मियों के नियमितीकरण से जुड़े कुंदन सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य प्रकरण सहित सभी पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया है। इससे सरकार को तगड़ा झटका लगा है। पुनर्विचार याचिकाएं खारिज होने के बाद सरकार के पास अब न्यायालय के आदेश पालन के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि 15 अक्टूबर 2024 को पारित निर्णय में किसी भी प्रकार की त्रुटि नहीं है। ऐसा आधार भी नहीं मिला है, जिसके कारण उस पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक हो।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की संयुक्त पीठ ने राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई की । अदालत ने बजट की कमी और प्रशासनिक जटिलताओं के आधार पर दी गई दलीलों को अस्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय के निर्णय को पूरी तरह उचित बताया।
अदालत के इस निर्णय से प्रदेश के हजारों उपनल कर्मियों को राहत मिली है। उपनल कर्मी पिछले कई वर्षों से नियमितीकरण, समान कार्य हेतु समान वेतन और बकाया भुगतान जैसी मांगों को लेकर संघर्षरत थे। इनके द्वारा शीघ्र स्थायी नियुक्ति की मांग को लेकर आज भी देहरादून में धरना – प्रदर्शन आयोजित किया जा रहा है।
गौरतलब है कि उत्तराखंड हाई कोर्ट ने वर्ष 2018 में दिए गए प्रमुख निर्णय (कुंदन सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य) में यह आदेश दिया था कि उपनल के माध्यम से विभिन्न विभागों में वर्षों से कार्यरत कर्मियों को चरणबद्ध रूप से नियमित किया जाए तथा उन्हें न्यूनतम वेतनमान के साथ महंगाई भत्ता प्रदान किया जाए। न्यायालय ने कर्मचारियों से किए जा रहे अनाधिकृत कर कटौतियों पर भी रोक लगाई थी। इस निर्णय को चुनौती देते हुए राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी, परंतु वहाँ भी याचिका खारिज कर दी गई थी
सुप्रीम कोर्ट से इस निर्णय के आने के बाद अब सरकार के पास एक मात्र विकल्प अदालत के आदेश का पालन करना है। अदालत ने कहा कि सभी याचिकाओं एवं इनसे जुड़े अंतरिम आवेदनों—जिनमें खुली अदालत में सुनवाई, विलम्ब की माफी, स्थगन और मौखिक सुनवाई की माँग शामिल थी—को अस्वीकार किया जाता है।
प्रदेश सरकार ने पुनर्विचार याचिकाओं में तर्क दिया था कि उपनल कर्मियों की नियमितीकरण प्रक्रिया में बजट का भारी बोझ पड़ेगा। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मात्र बजटीय समस्या के आधार पर वर्षों से कार्यरत कर्मियों के मूल अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि “समान कार्य के लिए समान वेतन” जैसी अवधारणा संवैधानिक सिद्धांतों का हिस्सा है और इसका पालन सरकार का दायित्व है।
इधर, हाल ही में राज्य कैबिनेट ने उपनल कर्मियों के नियमितीकरण हेतु एक उपसमिति गठित की है, जिसे दो माह में रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। उपनल कर्मियों का आरोप है कि मामला लटकाने के लिये सरकार कमेटी का खेल खेल रही है। इस पूर्व में बनी कमेटियों का क्या हुआ पहले सरकार को यह बताना चाहिए । इधर विभागीय मन्त्री का बयान आया है कि आरक्षण के कारण उनकी नियुक्तियों में बिलम्ब हो रहा है।
नैनीताल उच्च न्यायालय में उपनल कर्मियों की अवमानना याचिका 20 नवंबर को सुनवाई हेतु नियत है। उपनल कर्मियों को लगता है कि अनुपालन रिपोर्ट तैयार करने के लिये ही सरकार ने इस कमेटी का गठन किया है ताकि अदालत में अवमानना की कारवाई से बचा जा सके ।



