
आज पराक्रम दिवस पर खासकरी
दिनांक : 6 सितम्बर, 2025
क्रांतिकारी जयानन्द भारतीय । एक इनि शख्सियत जैन गढ़वाल जना ये शांत इलाका मा बि अंग्रेजों तैं भगौणै अलख जगै छै। गढ़वाल क्या पूरा उत्तराखण्ड मा अंग्रेजों का समणि वूंका खिलाफ नारा लगैकि वूंको खुला विरोध कन वळो वो एकमात्र क्रांतिकारी छ।
आजादी की लड़ैमा गढ़वाळ का जयानन्द भारती को योगदान उत्तराखंड का औरि कै बि बड़ा नेता से कम नी छ। संयुक्त प्रांत का लाटसाब सर मैलकम हेली को पौड़ीमा वूंकि ’अमन सभामा‘ तिरंगा झंडा दिखै की भारती जी को अंग्रेजों को विरोध कन एक इनि घटना छ, ज्यां कि कमी मिसाल मिलदन। पर झणि किलै उत्तराखंडमा आजादी कि लड़ै का इतिहासमा वूं तैं वो सम्मान कबि नी दिये गे जो मोहन जोशी, पी.सी.जोशी, मुकुंदीलाल बैरिस्टर, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, बद्रीदत्त पांडे या विशम्भर दत्त चंदोला जना कति आंदोलनकारियूं तैं दिये गे। श्री भारती तैं अधिक प्रचार व सम्मान नि मिनौ एक कारण यो बि ह्वे सकद कि वो समाज का एक दलित व अनुसूचित जाति का व्यक्ति छा अर प्रचार माध्यमूं व यूं से जुड़यां लुखूं तक वूं कि उतना पौंछ नी छै। या प्रचार माध्यमून वूं तैं इथा महत्व नि दे हो।
बीसवीं सदी का तीसरा चौथा दशकमा पूरा देशमा कांग्रेस की छत्र छायामा अंग्रेजों का दमन अर अत्याचार का बाबजूद कति लोग अंग्रेजूं कि खिलाफत कना छा अर यां खुणि आम जनता तैं प्रेरित कना छा। मगर इख कति अंग्रेजूं का पिठू बि छा, जु अंग्रेजूं तैं यो दिखौण चाणा छा कि गढ़वाळमा सब अमन चैन छ अर इख वूं को विरोध कन्नौ सास अब कैमा नी छ। सन् 1932मा अंग्रेज सरकारन गढ़वाळमा बि आंदोलनकारियूं कि धरपकड़ शुरू करि अर आजादी कि लड़ै लड़दरौं तैं जेलमा डालि दे। अंग्रेजूं का पिठूं कुछ लुखूं तैं लगि कि यो अच्छो मौका छ। यां से पैलि नवंबर 1930 मा प्रशासन का सहयोग से लैंसडौनमा ’अमन सभा‘ बणये गे छै, सन् 1932मा ‘अमन सभा’ का बुलौण फर हि लाटसाब सर मैलकम हेली पौड़ी औणा छा। अंग्रेजूं का पिठू यो दिखौण चाणा छा कि गढ़वाळमा कांग्रेस खतम ह्वे गे अर लोग अब अंग्रेजूं को शासन पसंद कना छन। यी बात जब वे टैम पर जेल बटि छुट्यां जयानंद भारतीन सूणे त् वूं को खून खौलि गे। वूंन लाट साब को विरोध कनौ फैसला करि दे।
पौड़ीमा 6 सितंबर, 1932 तैं लाटसाब को दरबार बंदोबस्त कार्यालय का समणि लगण वळो छौ। यां खुणि सख्त सुरक्षा बंदोबस्त करयां छा। मगर भारती तैं यां कि चिंता नि छै। वो बस कै बि तरां से लाटसाब का दरबारमा पौंछण चाणा छा।
दुगड्डा बटि भेष बदली वो 5 सितम्बरौं तैं रात पौड़ी पौंछनी अर रातमा अपणा द्वी औरि दगड़यूं दगड़ि वकील कोतवाल सिंह नेगी का घौरमा ऐनि। तिरंगा का तीन टुकड़ा जो ये तिन्नी दोस्त अपणा दगड़ि ला छा रातमा सिले गेनिे। 6 सितम्बरौ तैं भारती जीन तिरंगा अपणा अस्तीना भितर लुकै अर फिर भेष बदली लाटसाब का दरबारमा बैठि गेनि।
प्लानिंग का मुताबिक यूंका दगड़यूंन झंडा डंडा पिछनै बटि ऐथर यूंमा खिसकौंण छौ, मगर यांमा थ्वड़ा सि देर होण पर ये बीच लाटसाब मैलकम हैली कु अभिनन्दन पत्र पढ़े गे छौ। ये बीच लाट साब ब्वनि वळा छा, तबरि झंडा भारती जीमा पौंछदी वूंन फौरन झंडा पर डंडा चढ़ा अर तिरंगा झंडा पकड़ी खड़ु ह्वेकि ’गो- वैक मैलकम हैली‘ अर ’भारत माता की जय‘ का नारा लगौण शुरू करि देनि। नारा लगौंदी-लगौंदी वो मंच तक पौंछी गे छा कि तबरि पुलिसान वूं तैं घिरै दे।
अचणचकि भारती जी का विरोध का कारण अंग्रेजूं का पिट्ठूं लुखूं अर पुलिस प्रशासन का अधिकारियूं को पसीना छुटे गे। सभामा भगदड़ मचि गे। मैलकम हैली पुलिस का पैरामा डाक बंगला भागी। पुलिसान तिरंगा फाडी अर भारती जी तैं पिटण शुरू करि दे। मगर भारती जीन नारा लगौण बंद नि करे। आखिरमा भारतीजी को गिच्चो बंद कना वस्ता वूंका गिच्चामा रूमाळ कुच्चे गे। वूंका दगड़ा दगड़ि वख कुछूं तैं पुलिसान पकड़ी अर कुछ तैं लाठी मारी भगै। भारती जी फर हथगड़ी पैनये गेनि अर वूं तैं पौड़ी जेल लिजये गे।
भारतीय जी तैं ये घटना का बाद 28 सितम्बर, 1933 तैं सालभर बाद जेल बटि छ्वड़े गे। ईं घटना से भारतीन यो साबित करि कि गढ़वालमा अंग्रेजूं को विरोध खतम नि ह्वे। दगड़ै वो लुखूंमा अंग्रेजौं का खिलाफ नफरत अर लुखूंमा देशभक्ति जगौणमा वि कामयाब रैनि। वे टैम पर कै बि खुली सभामा अंग्रेजूं अर वो बि बड़ा लाट साब को विरोध कन छ्वटि बात नि छै। पौड़ी का कुछ बुजुर्गूं तैं आज बि वा घटना याद छ। हाजी अब्दुल वहीदन कुछ साल पैलि बतै छौ कि वो बि वीं सभामा छा अर वूंन बि भारती जी तैं पिटद देखी।
जयानंद भारतीय वूं आंदोलनकरयूंमा छा जौन अंग्रेजूं को खुली कि तैं विरोध करे। वो कति दौं जेल गेनि अर कांग्रेस का एक सच्चा सिपै का रूपमा वूंन पूरा उत्तराखंडमा जगा-जगौ जैकि आजादी कि लड़ै लड़दरौं तैं तय्यार करि। वो अपणा दलित वर्गमा बि जन चेतना का प्रतीक बणनी।
देशभक्त भारती को जनम 17 अक्टुबर 1881 खुणी पौड़ी कि सावली पट्टी कि अरकंडी गौंमा श्री छविलाल का घौरमा ह्वै छौ। शुरुमा वूंन अपुणु पैत्रिक धंधा जागरी को काम करी। फिर नौकरी का वास्ता नैनीताल, मसूरी अर देहरादूनमा अंग्रेज साबूं दगड़ि काम करि। सन् 1911 मा यूंन ’सत्यार्थ प्रकाश‘ पुस्तक पढ़ि अर यां का बाद वो आर्य समाजी ह्वे गेनि। स्वामी श्रदानंद का हाथूं से यूंन यज्ञोपवीत धारण करि। सन् 1914मा वो फौजमा भर्ती ह्वेनि अर प्रथम बिश्व युद्धमा यूरोप का कई देशूंमा लडै़ लड़णा का बाद सन् 1920 मा घौर ऐकि यूंन फौजै कि नौकरी छोड़ि दे। 1924 मा शिल्पकारुं कि पैलि डोला-पालकी बारात यूं का नेतृत्वमा संगठित ह्वे छै। वापस आण दां ईं बरात तैं सवर्णूंन लूट दे छौ। ईं घटना का बाद पूरा उत्तराखंड़मा डोला-पालकी आंदोलन का रूपमा शिल्पकारुं को सामाजिक न्याय आंदोलन शुरु ह्वे, जै तैं उच्च न्यायालयान बि नागरिक अधिकार का रूपमा मान्यता दे। 23फरवरी, 1941मा गढ़वाल का प्रमुख नेतौंन लैंसडौ़नमा सर्वदलीय बैठक करि अर शिल्पकारुं कु डोला-पालकी को उपयोग वूंको नागरिक अधिकार का रूपमा स्वीकार करि।
वूंन 1928मा पैलि बार गढ़वाल दलित बोर्ड की स्थापना करी अर भूमिहीन किसानूं तैं जमीन दिलौणौ काम शुरु करि। 1942 मा जब भारत छोडो आंदोलन मा वु डट्यां छा तबरियूं धौरमा वूंकि धरवाळि कि अचणचकि मौत ह्वे ग्ये। बादमा वूं को एक नौनो बि बिमरि का कारण मरि गे। यां का बाबजूद बि वो देश सेवा से बिचलित नि ह्वेनि। आजादी का बाद वूं तैं गढ़वाल कांग्रेस बटि प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का प्रतिनिधि बणै कि भिजे गे। जीवन का अंतिम वर्ष यूं का बिमारी मा हि कटनी। गम्भीर रूप से टी0बी0 होणा कारण 9 सितंबर, 1952मा 71साल की आयुमा वूं को निधन ह्वे।
=बिमल नेगी



