खटीमा व मसूरी के बलिदानी शहीदों को याद करते हुए .
पौड़ी में आज के दिन 2 सितम्बर, 1994 की ऐतिहासिक रैली

दिनांक : 2 सितम्बर, 2025
पौड़ी । सितम्बर शुरू होते ही हर साल बरबस ही मन के घाव भी हरे हो जाते हैं। सन् 1994 का उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन इस महीने के पहले दो दिन वो घाव दे गया जो भुलाये नहीं भूले जाते ।
1 सितम्बर को खटीमा और 2 सितम्बर को मसूरी गोलीकांड में 13 आंदोलनकारियों की शहादत और बड़ी संख्या में आंदोलनकारियों घायल होना हर साल इन दिनों मन में एक टीस, एक चुभन पैदा करती है। हम तमाम उन लोगों के दिलों में जिन्होंने उत्तराखण्ड राज्य के लिये संघर्ष किया एक सिहरन पैदा होती है। इन शहीदो के बलिदान से ही हमारा पृथक राज्य उत्तराखण्ड का सपना पूरा हुआ है।
उन दिनों को याद करता हूँ तो सोचता हूँ कि यदि आज का सोशल मीडिया उस जमाने होता तो 2 सितम्बर, 94 को पौड़ी की क्या स्थिति होती । मुझे लगता है कि खटीमा और मसूरी की घटनाएं तब पौड़ी में जो कुछ होता उससे पीछे छूट जाती। इस विशाल रैली में लोगों के आक्रोश को थामना उस समय पुलिस प्रशासन के लिये मुश्किल हो जाता । मसूरी गोलीकांड की घटना की सूचना पौड़ी में आंदोलनकारियों तक यथा समय नहीं पहुंची जिससे एक बड़ा हादसा सहज ही टल गया।
आज 2 सितम्बर का ही दिन था जब पौड़ी में उत्तराखण्ड आंदोलन को धार देने के लिये एक विशाल रैली का आयोजन हुआ था। इस विशाल रैली की चर्चा इसलिये आज कहीं नहीं होती क्योंकि इसी दिन मसूरी में भयंकर गोलीकांड हुआ । पौड़ी के लिये यह उत्तराखन्ड आंदोलन की ऐतिहासिक रैली थी । 2 अगस्त,1994 को पौड़ी में ही उत्तराखन्ड क्रान्ति दल ने तीन प्रमुख मांगों के लिये इन्द्रमणि बडोनी के नेतृत्व में भूख हड़ताल शुरू की थी । तब इसमें पृथक उत्तराखण्ड राज्य की मांग कहीं नहीं थी। यह तो 7 व 8 अगस्त की दरम्यानि रात को पुलिस की लाठी चार्ज के बाद 8 अगस्त को पौड़ी में हुए विशाल जन प्रदर्शन, पथराव व लाठीचार्ज ने पूरे उत्तराखण्ड को आंदोलित कर दिया । फलस्वरूप धीरे – धीरे वे तीन मांगे पीछे रह गयी और पृथक उत्तराखण्ड राज्य की मांग जोर पकड़ने लगी । आठ अगस्त को ही पौड़ी में पुलिस फायर ब्रिगेड का ड्राइबर जीत सिंह गुरंग स्टेशन छतरी के समीप पथराव के कारण गाड़ी पलटने से शहीद हो गया । वह उत्तराखंड आंदोलन का पहला शहीद है । लेकिन उसे भी भुला दिया गया।
पौड़ी में 2 सितम्बर, 1994 की विशाल रैली भी इसी पृथक राज्य आंदोलन को मजबूत करने के मकसद से बुलायी गयी थी । 2 अगस्त से यूकेडी द्वारा शुरू किया गया यह आंदोलन उनके हाथ से लगभग फिसल चुका था । राजनीतिक ताकतें भी धीरे – धीरे प्रचण्ड होते आंदोलन में अवसर तलाशने लगे थे। खटीमा और मसूरी गोलीकांडों ने तो उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जड़े जमाने में घी का कार्य किया । इन दोनों गोलीकांड की शहादतों के साथ पौड़ी की इस विशाल रैली ने उत्तराखण्ड पृथक राज्य आंदोलन को एक नयी दिशा दी।
पृथक राज्य आंदोलन के नाम पर पौड़ी की आज के दिन की उस ऐतिहासिक रैली को भीड़ के हिसाब से हम चाहे बेहद कामयाब कहें लेकिन रैली में हुई अराजकता के कारण यह आंदोलन के नाम पर एक मैसेज छोड़ने में पूरी तरह नाकामयाब रही।
उस समय मैं अमर उजाला में था। रैली से पूर्व इसकी कवरेज की व्यवस्था और रैली के बाद इसकी सफलता के बारे में अमर उजाला मेरठ के तत्कालीन संपादक अतुल माहेश्वरी ने मुझसे बात की थी। आंदोलन बढ़ने के साथ अखबार का सर्कुलेशन भी बढ़ने लगा था तो उनकी पैनी नजर इस आन्दोलन पर थी। उन्होंने इस रैली के बाद जब मुझसे संख्या के बारे में पूछा तो मैने कहा कि तक़रीबन पच्चीस से तीस हजार की भागीदारी होगी । पौड़ी जैसे छोटे नगर में इतने लोग उन्हें विश्वास नहीं हुआ । लेकिन मेरा आंकड़ा पूरी तरह से सच न सही सच के करीब तो था ही।
इस दो सितम्बर, 1994 की विशाल रैली की यादें जिन लोगों को होंगी उन्हें याद होगा कि उस दिन पौड़ी की सड़कें आंदोलनकरियों से गुलजार थी। रैली में आंदोलनकारी कंडोलिया मैदान में एकत्रित हुए थे। यहाँ से शुरू हुई विशाल रैली का एक सिरा बस स्टेशन पहुँच चुका था लेकिन दूसरा वहीं काडोलिया मैदान था जहाँ से रैली शुरू हुई । पूरे प्रदेश से लोगों के पहुंचने का सिलसिला दोपहर तक जारी था। लोगों को . श्रीनगर रोड पर प्रेमनगर, कोटद्वार रोड पर कान्वेंट और देवप्रयाग रोड पर द्वारीधार से पैदल ही आना पड़ रहा था। नगर के चारों ओर गाडियाँ खड़ी करने की जगह ही नहीं बची थी।
रैली हेतु जिस कदर आंदोलनकारियो में उत्साह था उतना ही उन्हें रैली के बाद होने वाली जन सभा से निराश होना पड़ा । रैली अराजकता का शिकार हो गयी। मंच से बोलने हेतु माइक की छीना झपटी और नेताओं की आपसी टकराहट ने इसे कामयाब नहीं होने दिया । रैली स्वतः स्फूर्त थी इसलिये यह भी हो सकता था कि तत्कालीन मुलायम सरकार के इशारे पर ही इसमें अराजकता फैलाने का काम हुआ हो। उत्तराखण्ड संयुक्त छात्र संघर्ष समिति जो अन्य संगठनो के साथ मिलकर इसके आवाह्न में लगी थी उसके छात्र नेताओं को भी इसमें बोलने का मौका नहीं मिला । हाँ, बस स्टेशन में सभा के दौरान हुई दो सांड़ों की लडाई से आंदोलनकारियों का मनोरंजन ही नहीं हुआ उनके चोटिल होने का खतरा भी पैदा हो गया था।
अब आते हैं सोशल मीडिया की उस बात पर जिसकी चर्चा हमने लेख के शुरू मै की थी। पौड़ी में दो सितम्बर की वह रैली भले ही अराजक रही हो लेकिन आंदोलनकारियों की शांतिपूर्वक अपने घरों की वापसी हुई । अब सोचो यदि उस समय आज की तरह हर हाथ में मोबाइल होता तो…. तो पौड़ी तो जल ही जाता । मसूरी की घटना पौड़ी में तब सुनायी देने लगी जब आंदोलनकारी वापस निकलने लगे थे। वह भी कुछ – कुछ लोगों तक ही बात पहुँच पायी । अगर आज जैसा सोशल मीडिया का जमाना होता तो पौड़ी में उस समय आंदोलनकारियों का आक्रोश चरम पर होता और तब न जाने क्या – क्या होता । यह सोचने पर आज भी मन में भय पैदा होता है।
आज हम खटीमा, मसूरी और मुज्जफर नगर के उन बलिदानी शहीदों और उन तमाम आंदोलनकारियों (केवल पेंशन लेने वालों की बात नही है) जिन्होंने इस राज्य के लिये अपना खून पसीना बहाया उनके लिये हृदय की गहराइयों से नमन करते हैं। शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि ।
= बिमल नेगी



