सत्ता के साथ चहलकदमी से बेखौफ अपराध तक
सरकार ने दिलाया जितेन्द्र आत्महत्या मामले में कठोर कार्रवाई का भरोसा
हिमांशु को गिरफ्तार कर ले जाती पौड़ी पुलिस ।
पौड़ी । आपराधिक मानसिकता के लोगों के सत्ता के साथ चहलकदमी से उनके हौसले बुलन्द होते जा रहे हैं। अपने आपराधिक कृत्यों को ढकने के लिये ऐसे लोगों को सत्ता के संरक्षण में रहना मुफीद लगता है। प्रदेश में बढ़ते आपराधिक ग्राफ के पीछे सामने आ रहे इस तरह के मामलों से तो कम से कम ऐसा ही लगता है कि सत्तानसीनों के संरक्षण मे इनके हौंसले बुलन्द हैं। पौड़ी के निकट गिरगाँव के तलसारी का मामला हो या इस बीच पंचायत चुनाव से जुड़े कतिपय मामले इन्हें इसी नजरिये से देखा जा रहा है।
ऐसा नहीं कि सत्ता और अपराधियों का गठजोड़ आज कल की बात हो, ऐसा तो बर्षो से हो रहा है । अन्तर इतना है कि पहले ये कार्य लुका – छिपी से होते थे और अब खुले आम हो रहे हैं । धौंस दिखा कर हो रहे हैं। पहले अपराध जगत के लोग ही सत्ता के साथ मिलकर ऐसे कारनामें करते थे, अब सत्ता में ही रूसूख रखने वाले सफेदपोश भी ऐसा करने की हिकामत करने लगे हैं। पहले सत्ता मैं रहने वाले, उनके परिजन या उनके बहुत करीबी लोग या पदाधिकारियों के बारे में ऐसा कम ही सुनने को मिलता था लेकिन अब ऐसे मामलों में बढ़ोतरी होते लगी है। वह भी तब जब प्रदेश में वह पारटी सत्ता में है जो स्वयं को सर्वाधिक अनुशासित व मर्यादित होते का प्रचार करती है। हरिद्वार की इस पारटी की पूर्व महिला जिलाध्यक्ष हो या फिर भाजयुमो के वर्तमान (अब निवर्तमान ) प्रदेश महामन्त्री हों या फिर ये कहें कि पारटी के एक पूर्व दर्जाधारी मन्त्री के सहाबजादे हों, ये सब तो इसी ओर इशारा का रहे हैं कि सत्ता का खौफ नहीं बल्कि संरक्षण में ऐसे कारनामें करने की इनकी हिम्मत हुई है।
हम यह नहीं कह रहे हैं कि सत्ता इनसे मिली है या सत्ता में बैठे हमारे नेता इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहे हैं लेकिन ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई करने में दबाब में रहने के कारण हिचकिचाहट भी सामने आती है। आखिर पहाड़ की बेटी अंकिता भण्डारी के मामले में क्या हुआ । सरकार एक तरफ बोलती रही कि कठोर कार्रवाई होगी और दूसरी ओर सरकारी रवैये से लोगों को ऐसा भी लगा कि वह दोषियों को बचा रही है। इस प्रकरण मै वीआईपी के खिलाफ कार्रवाई न होना या फिर विधायक के आदेश पर रिर्जाट में अंकिता के कमरे को तत्काल ध्वस्त किया जाना ऐसे मामले हैं जिनको जस्टिफाई किया जाना जरूरी था लेकिन नहीं हो पाया । इस मामले में पूरा पहाड़ आन्दोलित रहा लेकिन सरकार इसे फास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं ला पायी और आज भी अंकिता के परिजन ऱ्याय का इन्तजार कर रहे हैं।

यह सही है कि तलसारी में जितेन्द्र नेगी आत्महत्या प्रकरण में तत्काल कार्रवाई करते हुए पुलिस प्रशासन व सरकार ने इसे गभीरता से लिया है। जिलाधिकारी स्वाति भदोरिया व पुलिस अधीक्षक लोकेश्वर ने स्वयं गाँव जाकर परिजनों से मुलाकात की और मुख्यमंत्री ने भी उनसे बात कर कार्रवाई का भरोसा दिलाया लेकिन यह सब तो उन्होंने अंकिता भण्डारी प्रकरण में भी किया था। प्रशासन व सरकार की इस मामले में गम्भीरता तब सामने आयेगी जब शीघ्र इस मामले को अंजाम तक पहुंचाया जायेगा ।
प्रदेश में बढ़ रहे अपराधों के मामले में उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी की देवभूमि में गन कल्चर बढ़ रहा है, वास्तव में चिन्ताजनक है। सरकार इसे रोकने में असफल नजर आती है । इसलिये कोर्ट ने प्रदेश के डीजीपी और गृह सचिव को कोर्ट में तलब किया है और कहा है कि तमचे की अवैध फैक्ट्रियां खोजो और सप्लायर्स को गिरफ्तार करो। अब सरकार को तो स्वयं शर्म करनी चाहिए कि कोर्ट ऐसे मामलो में स्वतः संज्ञान लेकर फटकार लगा रहा है।
यह बात भी बेहद चिंताजनक है कि प्रदेश की राजधानी मे आर्थिक अपराध बढ़ते जा रहे हैं । खासकर भूमि की खरीद फरोख्त के मामले में ठगी का शिकार होने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। आज रातों-रात करोड़पति बनते का शार्टकट रास्ता यहाँ भूमि की खरीद फरोख्त से होकर जाता दिखायी देता है इसलिये हिमांशु जैसे सत्ता के संरक्षण में बैठे शातिर ऐसे कारनामों को अंजाम देने में पीछे नहीं हैं। सभी दलों के नेताओं से जुड़े ऐसे प्रकरण प्रायः मीडिया की सुर्खियां बनती रहती हैं। कई लोगों की बेनामी सम्पति, काली कमाई और आय से अधिक आकूत धनसम्पदा की चर्चा भी प्रायः ऐसे मामलों में सामने आती है।
ऐसे मामले केवल किसी दल विशेष की सरकार के समय ही सामने आये हों, ऐसा नहीं है। सत्ता का तो चरित्र ही ऐसा हो गया है कि इसकी छत्र छाया में गुपचुप अवैध कारनामें होते रहते हैं। अब पूर्व मन्त्री डॉ० हरक सिंह रावत अगर यह कह रहे है कि उन्होंने सरकार में रह कर खनन माफियाओ से उगाई की और पार्टी फन्ड में जमा किया और इस तरह एक पार्टी के खाते में 30 करोड़ जमा हुआ । उन्होंने वन मन्त्री रहते हुए यह कारनामा किया तो अन्य नेताओं ने भी तो सरकार में रहते हुए ऐसा किया होगा । आखिर उन्होंने एक करोड़ जमा किया तो बाकी के 29 करोड़ भी किसी ने जमा किये होंगे । यह भी तो आर्थिक अपराध है। अब सत्ता में बैठे लोग (जैस डॉ० हरक सिंह कह रहे हैं) ऐसा करेंगे तो रोकेगा कौन । बल बाढ़ ही उज्याड़ खाणी छ त क्य करे जौ ।
कई बार सत्ता के संरक्षण में माफिया और अफसरों का गठजोड़ भी कभी ऐसे आपराधिक कारनामों को करवाता है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती । पौड़ी में साढ़े तीन दशक पूर्व हुए उमेश डोभाल हत्याकांड में इसकी बानगी स्पष्ट देखने को मिलती है। उस समय देश भर के पत्रकारों के दबाब में सरकार ने इसमें सी० बी० आई० जांच करवायी । सामान्य व्यक्ति होता तो जांच भी नहीं होती । इसलिये यह कहना कि सत्ता के संरक्षण में आजकल ही ऐसा हो रहा है यह सही नहीं। हाँ, इतना जरूर है कि ऐसे मामलों में सत्ता के सुफेदपोशों का हाथ अब दिखाई देने लगा है और इनमें बढोत्तरी होने लगी है। सरकार को चाहिए कि अपने खुफिया तन्त्र को सक्रिय कर पारटी व सरकार के भीतर ऐसे लोगों को चिन्हित करे और उन्हें बाहर का रास्ता दिखाये । तभी सरकार व पारटी की शाख बची रह सकती है।
-बिमल नेगी



