पौड़ी। 11 फरवरी, 2028
प्रदेश में राजनीतिक दल अब चुनावी मूड में नजर आ रहे हैं। फरवरी, 2022 में पिछली बार विधानसभा चुनाव हुए थे। अब पांच साल पूरे होने का समय नजदीक आ गया है। भाजपा सरकार का 4 साल का वक्त गुजर गया। अब उसे भी दुबारा सत्ता में आने की फ्रिक होने लगी है। इधर, विपक्षी पार्टियां भी सत्ता की चाबियाँ हथियाने की जुगत में हैं। उन्होंने भी चुनावी समर के लिये रणनीतियों के साथ अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं।
चुनाव के लिये कमर कसते राजनीतिक दलों और नेताओं की नजर अब मछली की आँख की तरह सत्ता और अपने विधानसभा क्षेत्र पर है। सत्तारूढ़ भाजपा हो चाहे विपक्षी कांग्रेस या अन्य दल सभी को संगठन की मजबूती पर विशेष जोर है। इसके लिये वे तमाम पैंतरों की अजमाइश करने पर लगे हैं। नेता लोग भी अब एक दूसरे दलों में स्वयं को एडजस्ट करने की फिराक में दिख रहे हैं। ये दल जोड़ – तोड़ कर अपना कुनवा बड़ा करने पर लगे हैं। इधर, पिछले चुनाव में जीते व हारे नेताओं की नजर भी अपने क्षेत्रों में पड़ने लगी है। क्षेत्र भ्रमण से लेकर लोगों के साथ उठने बैठने से अब उनका परहेज खत्म हो गया है। चुनावी साल में कुछ ज्यादा ही प्रेम से दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में देर तक जोड़े रखने का अभ्यास अनेकानेक नेताओं ने शुरू कर दिया है।
प्रदेश कांग्रेस तो कुछ महीनों पहले तब से चुनाव की तैयारियों में व्यस्त है जब से उसने प्रदेश में नये प्रदेश अध्यक्ष, चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष और चुनाव प्रबन्धन समिति के अध्यक्ष की घोषणा की है तब से वह विभिन्न मंचों पर एकजुटता दिखाने का प्रयास करती नजर आ रही है। पार्टी के वे नेता जो एक दूसरे को फूटी आँख भी न सुहाते थे, वे भी एक दूसरे के गले में मालाएं डालते नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस को लगता है कि इस बार का चुनाव अनेक कारणों से उसके लिये सहज होगा। एन्टी इन्कम्वेंशी फैक्टर (सत्ता विरोधी लहर) कहें या भाजपा सरकार के खिलाफ कतिपय मुद्दों पर लोगों में गुस्सा, कांग्रेस को लगता है कि यह उसकी चुनावी वैतरणी पार कराने के लिये काफी है। कांग्रेस में विभिन्न जनमुद्दों को लेकर इस बीच कुछ सक्रियता भी दिखायी दी है फिर चाहे वह अंकिता भण्डारी हत्याकांड का मुद्दा हो या जंगली जानवरों के हमले का। पार्टी चुनावी मंसा से ही सही सत्तारूढ़ दल को घेरती नजर आयी है। पार्टी के चुनाव प्रबन्धन समिति के अध्यक्ष चुनावी बयानबाजी में कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखायी देते हैं। उनका कहना है कि जीतने वाले कंडीडेट को ही टिकट दिया जायेगा।
पिछले चुनाव और उसने बाद के हालात देखें तो कांग्रेस में मौकापरस्त और सत्तापरस्त नेताओं का पहले ही सफाया हो चुका है। ऐसे नेता या तो भाजपा में समा गये या सत्तारूढ़ दल के खौफ से पार्टी से अलग हो गये हैं। ऐसे में जिताऊ कंडीडेट ढूंढने में पार्टी को वक्त लग सकता है। यहाँ पार्टी में असमंजस बड़े नेताओं के कारण भी है जिन्होंने अभी तक अपनी सीट का खुलासा नहीं किया। यदि अचानक सीटें तय होती हैं तो दूसरे दल इसका फायदा लेने में पीछे नहीं रहेंगे।
कांग्रेस को भले ही कई कारणों से विधानसभा में जीत का रास्ता सहज लग रहा हो लेकिन अपने पिछले तजुर्बे से वे यह भी मानते हैं कि भाजपा जीत के लिये अन्तिम छणों में सब कुछ दाँव पर लगा सकती है। हरियाणा व अन्य प्रदेशों में उन्हें इसका अच्छा अनुभव है। कांग्रेस के पिछले एक दशक से सत्ता सुख से वंचित रहने के कारण वह आर्थिक रूप से भाजपा से पिछड़ती नजर आ रही है। यह आर्थिक पैमाना चुनावी महासंग्राम के लिये महत्वपूर्ण हो सकता है।
इधर, प्रदेश में अनेक मुद्दों पर घिरी भाजपा सरकार की जो भी स्थिति हो लेकिन पार्टी द्वारा चुनावी तैयारियाँ शुरू कर दी गयी हैं। भारतीय जनता पार्टी ने ‘मिशन 2027’ के लिए अभी से फील्डिंग सजानी शुरू कर दी है। पार्टी ने साफ संकेत दिए हैं कि सिटिंग विधायकों का टिकट उनकी परफार्मेंस के आधार पर ही तय होगा। पार्टी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि विधायक हो चाहे मन्त्री वे अपनी सीटों से ही चुनाव लड़ने की तैयारी करेंगे । इसके लिए राज्य में तीन स्तरीय गोपनीय सर्वे शुरू कराए गए हैं। पार्टी को पहले सर्वे की रिपोर्ट मिल चुकी है। जल्दी ही दूसरे स्तर पर सर्वे कराये जाने की तैयारी है। प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व का सर्वे अलग होगा।
बताया जा रहा है कि चुनावी तैयारी के सिलसिले में भाजपा कोर कमेटी की बैठक आगामी 14 फरवरी को पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे०पी० नड्डा की अध्यक्षता में सम्पन्न होगी। हालाँकि कोर कमेटी की घोषणा अभी नहीं की गयी है लेकिन प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट का कहना है कि जल्दी ही कोर कमेटी की घोषणा कर दी जायेगी।
भाजपा 2014 के बाद से राज्य में लगातार चुनावी सफलता हासिल कर रही है। पार्टी ने लोकसभा चुनाव में उत्तराखण्ड से पांचों सांसद दिये हैं और पिछले विधानसभा में भी बहुमत से सरकार बनायी है। पार्टी को लगता है कि वह इस बार भी सरकार बनायेगी। इसके लिये वे सरकार द्वारा जनहित में लिये गये फैसलों और विकास कार्यों को आधार बना रहे हैं। इधर, कई चुनावी विश्लेषक यह भी मानते है कि भाजपा वोटों के ध्रुवीकरण के लिये सनातनी समर्थन का मुद्दा जारी रखेगी। कई लोग ऐसे भी हैं जो कोटद्वार में हाल ही में ‘बाबा’ विवाद को इसी ऐंगल से देख रहे हैं और उन्हें लगता है कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं और भी देखते को मिल सकती हैं।
अब आगामी विधानसभा चुनावी तैयारियों मै प्रदेश के दोनों प्रमुख राजनीतिक दल एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में हैं। इधर, वामपंथी पार्टियां भी प्रदेश के तमाम मुद्दों पर मुखरता से अपनी आवाजें बुलन्द कर रही हैं। अंकिता भंडारी हत्याकांड में इन्साफ की मांग को लेकर वामपंथी दलों व अन्य जनसंगठनों की ‘पद यात्रा’ प्रभावी रही। लेकिन चुनावी साल में धरातल पर संगठन निर्माण को इन वामपंथी दलों द्वारा अधिक मजबूती देनी होगी। इधर, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी भी इन चुनावों में हाथ पैर मारने की पूरी कोशिश करेगी लेकिन इतना पहाड़ी क्षेत्र में आधार लगभग नगण्य है। मैदानी क्षेत्र की कुछ सीटों पर जरूर ये पार्टियां कुछ प्रभाव रखती हैं लेकिन जीत की गणित किस करवट बैठेगी यह उनके नेताओं की मेहनत पर निर्भर करेगी ।
अन्य दलों में क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखण्ड क्रान्ति दल जरूर तैयारियों में लगा दिखायी देता है। पार्टी की कमान इस समय अनुभवी नेता सुरेन्द्र कुकरेती के हाथों में है लेकिन उनके साथ अनेक युवा नेता पार्टी में जोश भरने का काम कर रहे हैं। परन्तु हाशिये पर खड़ी यूकेडी में ये कितनी जान डाल पायेंगे यह आने वाला वक्त बतायेगा। इसी प्रकार अन्य क्षेत्रीय दलों में उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी, उत्तराखण्ड स्वाभिमान मोर्चा, उत्तराखण्ड राष्ट्रवादी पार्टी, उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी समेत अन्य अनेक दल व संगठन हैं जो तमाम जन आन्दोलनों में शामिल हैं लेकिन राष्ट्रीय पाार्टियों की तरह उनकी धरातल पर चुनावी तैयारियाँ फिलहाल नजर नहीं आती हैं। ऐसी स्थिति में प्रदेश में क्षेत्रीय व अन्य दल किसी तीसरे मोर्चे का गठन कर पायेंगे अभी कहा नहीं जा सकता।
= बिमल नेगी



