हमुन् जैई बळदौ पैनो सिंग काया, वेनै हम पर घपगताळ लगाया
साहित्यकार वीरेन्द्र पंवार दगड़ि अयाळ जी की एक पुराणि मुखाभेंट

गढ़वाली कविता मा गुठ्यार, गुठ्यारमा कविता अर गुठ्यारौ कवि याने कि रघुवीर सिंह रावत’अयाळ’। कवि सम्मेलन मंच का आक्रामक कवि-केवल मंच ही ना बल्कि कविता अर हाव-भाव दुय्योंमा। वूंका व्यंग इन चुभदन जन गोर्वा पैना सिंगै घपगताळ।
सन् 1937मा गढ़वाल का पैडलस्यूं अयाळ गौंमा जनम्या अयाळ जीन् गढ़वाली भाषा की खूब सेवा करी। सन् 1952 बटि फिल्मी गाणौं कि पैरोडी बटि लेखन कि शुर्वात कन्न वळा अयाळ जी बादमा दिल्लीमा बस गे छा।
. गढ़वालीमा गीत लिखण से शुर्वात कन्न वळा अयाळ जी का द्वी कविता संग्रह छप्यां छन। पैलो गुठ्यार (1983) अर दुसरो ये गुठ्यार ( 1998)। ये गुठ्यार पर वूं थैं गढ़वाली साहित्य परिषद कानपुरान् वर्ष 1998 को प0 आदित्यराम नवानी पुरस्कार द्ये। सन् 1956मा दिल्लीमा हि अयाळ जी कि मुखा भेंट गढ़वाली का मूर्धन्य गीतकार जीत सिंह नेगी से ह्वे। ये द्वी कवि व गीतकार एकी गौं पैडुलस्यूं अयाळा छन। वो गीतकार श्री नेगी थैं अपणो प्रेरणा स्रोत मनदन। सन् 1976-77 का करीब वूंकि भेंट गढ़वाली का प्रसिद्ध कवि गिरधारी प्रसाद ’कंकाल’ जी का दगड़ा ह्वे। कवि ’अयाळ’ कंकाल जी से भौत प्रभावित ह्वेनि। कंकाल जी को असर अर प्रेरणा से सन् 1983 मा वूंको ’गुठ्यार’ नौ से पैलो कविता संग्रह छप्ये।
अयाळ जीन् गढ़वाली गीत लिखणै शुर्वात् 1957-58 बटि करि, वु अपणा जादातर गीत छन्दमा लिखदा रैनि। वूंको पैलो गीत छयो –
“किस्मत देख्यिकि म्यारू दिल दंग
श्यामा भग्यानि मे नि कर तंग।”
वूंकि हिन्दी कविता पैलि बार सन् 1958मा दैनिक ’बीर अर्जुन’मा छप्ये छै। पण गढ़वालीमा लिखणै शुर्वात वूंन 1975-76 बटि करि। वूंकि पैलि कविता ’ब्वेकि गाणि’ शीर्षक से छपी-
हे बेटा, भेजणू छौं त्वेथैं
पढ़ै लिखैकि, सैंति-पाळिकि
पर बेटा, वे परदेश जैकि/ मैं न भूलि/ मेरि दूदि को ख्याल करि।
वु बोलदन वूंन पट्ट वळा गीत कबि नि लिखनि, वूंका जतगा भी गीत छन, वूंमा साहित्यिक पुट जरूर रय्ये। जनकि-
“रोटी मा चूनै कि बौ रोटिमा चूनै की
खाणा को ठुंगार दे दे गारिमा लूणै की
भैजिमा जिकुड़ी तेरि तू मेरि सोनै कि बौया।“
वूंको बोलण छ कि गढ़वाली गीतोंमा प्रयोग होण वळो ’तीले धारू बोला’… से वु अभि भि सहमत नि छन। वु मणदन कि ’तीले धारू बोला’… पट्ट कै ढंगा शब्द को बिगड़यूं रूपै छ। इनो बि ह्वे सकदो कि यो कै वाक्य को अंश हो। ये पट्ट को सहि वाक्य ’तीन धार वाले भोला’ ह्वे सकदो। गढ़वाल या पहाड़ ’धार, खाळ’ को मुल्क छ। तीन धार से मतलब त्रिशूलधारी शिवजी से ह्वे सकदो। अज्ञानता का कारण येको रूप बिगड़ीक ’तीले धारू बोला… प्रचलन मा ऐगि। अर यो अज्यूं बी इस्तेमाल कर्ये जांदो। गढ़वाली मा शब्दों अर अर्थों का रूप भौत जल्दि बिगड़ जांदा या वेका रूप बिगड़नै सम्भावना पूरी रैंदि। इनि आर्मीमा एक वाक्य आंदो-’हू कम्स देयर’। यु अंग्रेजी को वाक्य छ यांको गढ़वालीमा एक शब्द बण्यूं छ- हुकमदार। अर्थ वी छ कि सावधान! क्वी आणू छ! इनि कई शब्द छन जु गढ़वालीमा इस्तेमाल होंदन। सन 1952 मा वो ग्रेफ (सीमा सड़क संगठन) मा नौकरी करदा छया अर चीन युद्ध का समय वो बौर्डर पर छा, त् वे बग्त वूंन राष्ट्र भक्ति गीत ’गढ़वाली जवान हम जौंला धमाधम…’ गीत लिखि छयो।
दिल्लीमा 1977-78 मा वूंकी भेंट गढ़वाली कवि जगदीश बडोला से ह्वे। श्री बडोला से वूंथैं नई शैलि की कविता लिखणै प्रेरणा भी मिलि। वु बोलदन जनि-जनि अनुभव होंदा गैनि अर कविता कि समज ऐ, बदलाव बि बढ़दा गै- कविता का शिल्प, शैली अर लिखण का तरीकौंमा बदलाव आंदा गैनि।
कविता-लेखन मा वूंन व्यंग विधा किलै चुनी,यां पर वूंको बोन्न छ कि व्यंगौ रस्ता करड़ो जरूर छ पर सहि रस्ता यो ही छ। अजकाल सीधी बात सुणनौ क्वी तैयार नी छ। गाळि देकि सतर्क करो, चैलेन्ज करो। करड़ो बोन्न से आदमी बुरो मनदो पण सोचणौ मजबूर ह्वे जांदा कि वेन इन किलै बोलि। कविता तीखापन ल्हेकि चलण चयेंद। विपक्षमा रैण से पक्ष चेतळो रैंदो। इना हि रंगमा रंगयीें राजनीति पर व्यंग कसदि वूंकि एक कविता भौत लोकप्रिय छ-
“हमन् जैई बळदौ पैनो सिंग काया
वेनै हम पर घपगताळ लगाया।”
ई कविता अर इनि कई कवितौं का माध्यम से वो अपणी कविता-यात्रा मा लग्यां रैनी। वु बोलदन सुविधा जादा होण से अजकाल लोग साहित्य कम पढ़ना छन। बच्चा भी आराम तलब ह्वेगेनि। इलै वो साहित्य पढ़न नि चाणा छन। पण एकाएक इन बी नी छ। पढ़न वळा पढ़नै लग्यां छन। गढ़वालीमा गद्य लिखणैं आदत कम होणी छ। नई छ्वाळ का लोग कविता जादा इलैई लिखणा छन किलैकि कविता वूं थैं साहित्यकार बण्ना को शार्टकट साधन लगदो। जबकि यु काम भौत कठिन छ। दरअसल मनखि कुछ स्वार्थी भी भौत ह्वेगे। मनखि कि ई प्रवित्ति पर चोट कर्द वूंकि एक कविता को अंश-
अपणो मुण्ड बल अफी नि मुंड्ये जांद
एक ब्वनै बात छ किलै कि यामा
बड़ा-बड़ा जाळ्योंक हाथ छ।“
अयाळ जी कि खास बात या छ कि वो अपणि बात साफ शब्दोंमा बिना कै लाग लपेट का बोलदन पण वो चंट चकड़ेतू कि खाल भी अधेड़दन।
ये समय गढ़वालमा गढ़वाली भाषा अर साहित्य का नौं पर केवल कवि-गोष्ठी अर कवि-सम्मेलन उर्यये जाणा छन अर यांसे ऐथर कुछ नि होणू छ। वंूबि सरकारी मदद् से या कबि कै संस्थाथैं याद ए जांद त सालमा एकाध कार्यक्रम ह्वे जांदन। इन पुछण पर कि क्या केवल कविता का माध्यम से हि गढ़वाली भाषा अगनै बढ़ जाली? त् वु बोलदन कि अकेला कविता भाषा थैं अगनै बढ़ाणमा कामयाब नि ह्वे सकदि। यकड़ो बल्द कतगा जि हौळ लगालो। साहित्य कि हर विधामा लेखन होण चयेंदो। हर तरह को लेखन होण चयेंदो तभी भाषा का शब्द बच्यां राला अर अगनै बढ़णा राला।
भाषा थैं बातचीतमा भी रैण चयेंद, यांसे भाषा को दबाव त् रालो हि, किताब भी छप्येणी राली। साहित्य भी रच्येणू रालो। इलै भाषा थैं बच्चैकि रखे जाणो भौत जरूरी छ। आजै गढ़वाली कविता का बारामा वूंको मनणो छ कि आजा कवि व्यंग जादा लिखणा छन। अर या भौत अच्छि बात छ कि आज जादा पावरफुल कविता लिखे जाणी छन। गढ़वाली कविता को भविष्य अच्छो छ। आज जो कविता लिख्ये जाणी छन पैल्यी कवितौ से कमतर नि छन। पर कव्यों थैं हौरि लोखूं थैं भी पढ़न चयेंदो।
अजकाल भाषा का वास्ता भौत अच्छो काम होणू छ। धाद, उत्तराखण्ड खबरसार, चिट्ठी-पत्री अर गढ़वालै-धै भौत अच्छो काम कन्ना छन, या कोशिश जारी रखे जाण चयेंदन।
(उत्तराखण्ड खबर सार, 15 फरवरी, 2001)



