
दिनांक : 17 सितम्बर, 2025
पौड़ी । देहरादून में अतिवृष्टि से आयी आपदा के हालातों के बीच वरिष्ठ साहित्यकार व गीतकार वीरेन्द्र पंवार द्वारा लिखा और प्रसिद्ध लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी द्वारा गाया गीत ‘छोड़ा पाडियूं घौर गौं – मारा तांणी देरादूण की बरबस ही याद आती है। बल ‘बिन्डी खाणू जोगी हों अर पैला बास भुक्खी रौं’।
यह गीत व्यंग्यात्मक नहीं है । वास्तविकता दर्शाने वाला है लेकिन अब आपदा की पृष्टिभूमि में देखें तो नजरिया बदलता भी दिखायी दे रहा है।
पहाड़ की आपदा, मुसीबतों व समस्याओं से निजात पाने के लिये ही तो हम पहाड़ी देहरादून या अन्यत्र बसते जा रहे हैं। यहाँ ऐशो- आराम होगा, सुख – सुविधाएं होगी, भव्य लाइफ स्टाइल होगी, सुरक्षित परिवेश होगा, यही तो सोचते हैं हम एक जगह से दूसरी जगह पलायन करते समय । पर उस समय हम दोहरी बात यह नहीं सोचते कि यह तो जीवन है और जीवन में मुसीबतें तो आती – जाती रहती हैं फिर आप चाहे चमोली, पौड़ी में रहो या फिर देहरादून । 15 व 16 सितम्बर की दरमियानी रात की अतिवृष्टि ने देहरादून शहर ही नहीं आसपास के इलाकों को जो घाव दिये उससे अब पीड़ित वे लोग जो पहाड़ से पलायन कर गये होंगे , वे यही सोच रहे होंगे।
निश्चित रूप से हम सब पहाड़ वासी देहरादून के उन प्रभावित पीड़ितों के साथ हैं। सितम्बर के इन दिनों बारिश का ऐसा कहर कम ही देखने में आता है। मानसून की वापसी विलम्बित है, स्पष्ट है कि मौसम चक्र बदल रहा है। अब जलवायु परिवर्तन के जो भी कारण हों लेकिन इस तरह अतिवृष्टि व बादल फटने से आयी आपदा देहरादून वासियों को सितम्बर के महीने में पहली बार अपने जीवनकाल में झेलनी पड़ी है।
एक दो दिन पहले की बरसात में देहराइन की लगभग सभी नदियों में पानी बढ़ने से बाढ़ की विभीषिका नजर आयी । फिर चाहे वह रिस्पना, टौंस, सौंग, तमशा, बिन्दाल, आसन, सुसुवा, जाखन, सुर्वणा हो या ऋषिकेश में बहने वाली चन्द्रभागा या गंगा नदी ही क्यों न हो । सभी नदियाँ आक्रोशित नजर आयी । अपने तटबन्धों पर गहरे घाव ही नहीं छोड़ गयी बल्कि कई नदियों का पानी तो बस्तियों में घुस गया । देहरादून में अनेक बस्तियां पानी से जलमग्न दिखायी दी। जहाँ बादल फटा वहाँ भारी तबाही का मंजर था। ऋषिकेश का हाल भी देहरादून से कम बुरा न था।

देहरादून में आपदा की खबरों से मीडिया भरा पड़ा है इसलिये यहाँ इसे बड़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करने का कोई मकसद नहीं । मकसद बस इतना है कि सुरक्षित ठौर की तलाश में यदि हम पहाड़ छोड़ कर मैदानी क्षेत्रों में पलायन कर रहे हैं तो देहरादून की आपदा हम सब लोगों के लिये एक सीख व रैबार दे कर गयी है। अगर अत्यधिक मजबूरी न हो तो पहाड़ के घर गाँव में अपनी कई बीघा जमीन छोड़कर तीन या पांच विश्वा जमीन में जिन्दगी आरामदायक कैसे हो सकती है, इस पर हमें पुनः चिन्तन मनन करना पड़ेगा ।
हम को इस बात का भी चिन्तन करना पड़ेगा कि मैदानी क्षेत्र के जिस किसी शहर (चाहे वह देहरादून ही क्यों न हो) में भी हम पलायन कर रहे हैं क्या वह पहाड़ी शान्त परिवेश में रहने वाले हम लोगों के लिये सुरक्षित भी है ? आज जिस तरह शहरों में क्राइम बढ़ रहा है। प्रदूषण बढ़ रहा है। ट्रैफिक बढ़ रहा है। मंहगाई बढ़ रही है। सप्रदायिक तनाव बढ़ रहे हैं । औसत जीवन घट रहा है तो क्या हम पहाड़ी स्वयं को ऐसे माहौल में खफा सकेंगे । मैं ऐसे कई बुजुर्गो को जानता हूँ, कई प्रायः मिलते रहते हैं जिन्होंने देहरादून घर बनाया है लेकिन वहाँ रहना पसन्द नहीं करते । कई हमारे साथी ऐसे भी थे जिन्होंने बढ़े शौक से घर बनाया लेकिन उसका उपयोग स्वयं नहीं कर पाये ।
तो फिर नौकरी या बिजनेस या कोई भी काम धन्धा करने के बाद वापस अपने गाँव लौटने में क्या बुराई है। आज से तीस साल पहले लोग पेंशन लेकर या नौकरी के बाद सीधे गाँव आते थे लेकिन अब दुर्भाग्य यह है कि जो जहाँ नौकरी करने जा रहा है वहीं का हो जा रहा है। परन्तु यह एक अलग बात है कि नौकरी में रहना पड़ेगा लेकिन नौकरी जिन्दगी भर पहाड़ में की और अब आखरी समय मैदान की ओर भागमभाग । बुढापे में लोग शान्ति की तलाश में पहाड़ चढते हैं अर हम पहाड़ी बुढापे के सुकून के लिये मैदानों में भाग रहे हैं। मकान बनाना ही है तो पहाड़ में भी आप सुविधा सम्पन्न खुबसूरत मकान बना सकते हैं।
पहाड़ से पलायन करना बहुत कुछ देखा – देखी भी है। एक दूसरे को देहरादून या अन्यत्र मैदानी क्षेत्र में सिर छिपाते देख हमारे मन में भी यह विचार स्वतः ही घुस आता है कि पैसे का इन्तजाम होते ही (चाहे वह कर्जे से ही क्यों न हो) हम भी निकल पड़ेंंगे । बल जब सब्बि धाणी तखी देरादूण मा ही छ त काण्डा लगा ये पाड़ फर ।
पहाड़ में समस्याएं अपनी जगह हैं। जंगली जानवर हैं, बाधित सड़कें हैं, सड़कें नहीं हैं, चढ़ाई उत्तराई है, स्वास्थ्य, शिक्षा की गुणवता इतनी बेहत्तर नहीं है, बिजली, पानी की समस्या है, ट्रान्सपोर्ट की समस्या है, बेरोजगारी है, और भी कई समस्यायें हैं । लेकिन यहाँ रहने वाले भी तो डटकर मुकाबला कर रहे हैं। हमारे पुरखों ने भी तो यहीं संघर्ष कर इन्हें रहने योग्य बनाया । हम अपने बच्चों की पढ़ाई के लिये, अपने इलाज के लिये निश्चित रूप से शहरों को रुख कर सकते हैं लेकिन केवल इसी तर्क पर सदा के लिये पहाड़ छोड़ना, पहाड़ के साथ अन्याय करना है । पहाड़ मे जनसंख्या बढ़ेगी तो हम सरकार पर भी इसे और बेहत्तर सुविधा सम्पन्न बनाने के लिये दबाब बना सकते हैं। लेकिन अब तो ऐसा हो गया कि ‘लोळि सड़की बल तु अब ऐ गौमा जब सर्यू गौं परदेश चलीगे । गौं खाली ह्वे गे ।’
आज दुनिया के सर्वाधिक खुबसूरत पर्यटक स्थल पहाड़ो में ही हैं । शिमला, मसूरी, नैनीताल भी तो पहाड़ में ही हैं। दुनिया के किसी देश के पहाड़ों में चले जाइये । यह उन लोगों की रहने की सर्वाधिक पसंदीदा और सुरक्षित जगह हैं । उन्होंने अपने संघर्ष व सरकारों के सहयोग से प्लानिंग के तहत इन्हें खुबसूरत बनाया है। हम भी तो ऐसा कर सकते हैं। देर भले ही हो लेकिन एक दिन ऐसा हो सकता है।
आज तमाम लोग मैदानी क्षेत्रों से आकर यहाँ पहाड़ मे जमीने खरीद रहे हैं, अब वे इतने भोले या बेवकूफ तो नहीं होंगे। बल ‘चुला फुण्डा वुण्ड फुंड अर वुंड फुंडा चुल्ला फुंड’ । उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में ही अनेक जमीने बाहरी लोगों के कब्जे में जा चुकी हैं । सरकारी नियमों के तहत निवेश करना अलग बात है और पहाड़ मे मौज मस्ती के लिये जमीन खरीदना अलग बात । इसलिये पहाड़ के लोगों को अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने के लिये आगे आना ही होगा ।
यह बात अब देहरादून की आपदा को देखते हुए और भी जरूरी है। मैदानी क्षेत्र केवल नौकरी के लिये होने चाहिए । सुरक्षित भविष्य के लिये हम पहाड़ियों को अपने पहाड़ की तरफ ही रुख करना होगा। यदि पहाड़ में सब कुछ बेचकर बाहर जाने की सोच रहे हैं तो यह आत्मघाती सोच होगी । एक दिन जरूर आयेगा जब परदेश गये पंछी को वापस अपने घोसले में लौट कर आना होगा और मुझे विश्वास है कि वह दिन आवश्य आयेगा ।
= बिमल नेगी



