बाघ मारें तो जेल और बाघ आदमी मारे तो….
राष्ट्रीय वन्य जीव सप्ताह में वन्य पशुओं के संरक्षण पर जोर

हिंसक पशुओं के शिकार होने पर मुआवजे की रकम छ: लाख से बढ़कर 10 लाख
उत्तराखण्ड में लगभग सभी गाँवों के आसपास हिसंक जंगली जानवरों की चहलकदमी
विश्व पशु कल्याण दिवस आज
पौड़ी । पशु संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिये आजकल राष्ट्रीय वन्य जीव सप्ताह (2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर) मनाया जा रहा है। आज विश्व पशु कल्याण दिवस (4 अक्टूबर) भी है। बेजुवान पशुओं की देखभाल के साथ उनसे प्रेम कर प्रकृति में संतुलन बनाये रखना हम सब का कर्तब्य ही नहीं जिम्मेदारी भी है । मगर बढ़ते वन्य जीव व मानव संघर्ष ने हिंसक वन्य जीवों के प्रति आम जनमानस के मन में जो खौफ और आक्रोश पैदा किया है, उससे सरकार की वन्य जन्तु संरक्षण नीति पर ही सवाल खड़े होने लगे हैं।
वन्य जन्तु संरक्षण के प्रति हम सभी एकमत और सहमत हैं। लेकिन बात जब हिंसक पशु और मानव में किसी एक के जीवन के संरक्षण की हो तो स्पष्ट है कि मनुष्य के जीवन की कीमत पर हिंसक जंगली जानवरों का संरक्षण नहीं किया जा सकता । आज के इस दौर में उत्तराखण्ड में तो कम से कम यही नजर आता है कि सरकार हिंसक जंगली जानवरों के शिकार होते लोगों की कीमत पर वन्य जन्तुओं के संरक्षण में लगी है। आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखण्ड गठन से लेकर पिछले वर्ष 2024 तक वन्यजीवों के हमले में 1221 लोगों की मौत हुई है और 6123 लोग घायल हुए हैं। प्रदेश में इस साल भी अब तक वन्यजीवों के हमले में कई लोगों की मौत हो चुकी है और अनेक घायल हो चुके हैं।
प्रदेश में वन्य जन्तु और मानव संघर्ष में बढ़ते मामले और जनाक्रोश को देखते हुए सरकार ने अब हिंसक जंगली जानवरों के शिकार मे मृतक के परिजनों हेतु मुआवजा राशि को छः लाख से बढ़ाकर 10 लाख करते की घोषणा की है। यह घोषणा प्रदेश के मुख्य मंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वन्य जीव सप्ताह के अवसर पर देहरादून जू में आयोजित एक समारोह मे की है। हलाँकि इसी वर्ष अगस्त में वन विभाग ने शासन को एक पत्र लिखा था। इसमें अनुग्रह राशि को 10 लाख करने का अनुरोध किया गया था। पत्र में ऐसे मामलों में महाराष्ट्र में 25 लाख देने, कर्नाटक में 20 लाख देने, बिहार और उड़ीसा में 10-10 लाख की अनुग्रह राशि देने का उल्लेख किया गया था।

प्रभावित परिवारों को मुआवजा बढ़ाये जाने से स्पष्ट है कि सरकार यह मानती है कि भविष्य में भी हिंसक वन्य जानवरों के साथ हमारा संघर्ष जारी रहेगा । आशय यह कि इन हिंसक जंगली जानवरों को बचाने के लिये लोगों को अपनी बलि देनी जारी रखनी पड़ेगी । अब अगर जंगलों में घुसने से मानव हिंसक जंगली पशुओं का शिकार हो जाता है तो इसे मानव जनित भूल, गलती या अपराध कहा जा सकता है लेकिन यदि वही जंगली जानवर मानवीय बस्तियों में आकर लोगों का शिकार करता है तो इसके रोकथाम के लिये सरकार पहले ही हाथ खड़े कर चुकी है। मतलब यह कि वन्य जीवों के संरक्षण के लिये तो वन्य जन्तु अधिनियम 1972 बन गया और उसे और अधिक कठोर बनाने के लिये उसमें समय – समय पर संशोधन किये गये, नियम, उपनियम जुड़ते चले गये लेकिन लोगों के संरक्षण के लिये सरकार ने चुप्पी साध ली । आलम यह है कि कई बार जब तक दो चार लोगों का शिकार न हो जाय सरकार तब तक उस हिंसक पशु को मारने के आदेश भी जारी नहीं करती । कभी कभी ऐसा भी देखने में आता है कि जिस क्षेत्र के लोगों की सरकार तक जितनी पहुंच है वहाँ उतनी जल्दी या देर से उस हिंसक जानवर को मारने की परमिशन दी जाती है।
अब लोगों का आक्रोश इसी बात को लेकर है कि हिंसक जानवरों के संरक्षण हेतु तो अधिनियम बना दिया लेकिन वही हिंसक जानवर यदि मानव बस्ती में आकर उनके घर में घुसकर लोगों का शिकार करता है तो मानवीय संरक्षण के लिये कोई अधिनियम नहीं। जब व्यक्ति मर ही जायेगा तब मुआवजा मिलेगा । अब जब व्यक्ति विशेष या उनकी संतति मर ही गयी तो उसका जीवन तो लौटाया नहीं जा सकता । ऐसी स्थिति में यदि सरकार यह सोचती है कि मुआवजा देकर लोगों के गुस्से को शांत किया जा सकता है तो यह सरकार का भ्रम मात्र है ।
हमारे देश में वन्यजीवों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण क़ानून है वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972। इसे सामान्यतः Wildlife Protection Act (WPA) कहा जाता है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य है जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों की रक्षा करना, शिकार पर रोक लगाना और उनके आवास (Habitat) को बचाने के लिए Sanctuary (अभयारण्य) और National Park (राष्ट्रीय उद्यान) जैसी संरक्षित श्रेणियाँ बनाना। यह अधिनियम 1972 में पारित किया गया था ताकि लगातार हो रहे शिकार, वन विनाश और वन्यजीवों के अवैध व्यापार को रोका जा सके ।
भारत में वन्य जीव सप्ताह की शुरुआत 1957 में हुई थी, और यह 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर के बीच मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य वन्य जीवों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह एक दीर्घकालिक सरकारी पहल का परिणाम है जिसकी शुरुआत वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए भारत में 1952 में हुई थी। पहला वन्यजीव दिवस 1955 में मनाया गया। बाद में वन्यजीव दिवस को बदलकर वन्यजीव सप्ताह कर दिया गया और पहला वन्यजीव सप्ताह 1957 में मनाया गया।
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 को और अधिक कठोर और कारगर बनाने हेतु बाद में इसमें कई संशोधन अधिनियम और नियम बनाए गए हैं, जिनमें वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 1991, 2002, 2006 और 2022 प्रमुख हैं, साथ ही पिछले वर्ष वन्यजीव लाइसेंसिंग नियम, 2024 भी जारी किये गये हैं, जो वन्यजीवों की सुरक्षा को और सशक्त करते हैं और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण करते हैं। वन्य जन्तु अधिनियम 1972 के अन्तर्गत वन्य जन्तुओं के संरक्षण हेतु कई अनुसूचियाँ बनायी गयी हैं । अपराध की गंभीरता इस पर निर्भर करती है कि संबंधित प्रजाति किस Schedule (अनुसूची) में है। मसलन अनुसूची एक से जुड़ा अपराध सबसे गंभीर माना जाता है और इसके लिए कठोरतम सज़ा मिलती है। इस अनुसूची में बाघ, काला हिरण, हिमालयी भूरा भालू, क्लाउडेड तेंदुआ, नीली व्हेल, हाथी, गैंडा, भारतीय डॉल्फ़िन, हॉर्नबिल आदि शामिल हैं। अनुसूची दो में असमिया मकाक, भारतीय नाग, सुस्त भालू, विशाल गिलहरी, जंगली कुत्ता, भारतीय गिरगिट आदि रखे गये हैं। इसी प्रकार अनुसूची तीन में चीतल (चित्तीदार हिरण), भारल (नीली भेड़), सांभर, लकडबग्घा आदि हैं । अनुसूची चार में राजहंस (फ्लेमिंगो), खरगोश, बाज़, किंगफिशर, मैगपाई, हॉर्सशू क्रैब हैं तथा अनुसूची पांच में इस अनुसूची में ऐसे जानवर शामिल हैं जिनका शिकार किया जा सकता है, जैसे सामान्य कौवे, फल चमगादड़, चूहे और मूषक आडि शामिल हैं। यहां केवल कुछ उदाहरण हैं और विभिन्न अनुसूचियों में दर्जनों अन्य पशु प्रजातियों को रखा गया है।
वन्य जन्तुओं को संरक्षित किये जाने हेतु केन्द्र सरकार द्वारा ही अधिनियम और कानून बनाये गये हैं और प्रदेश सरकार के हाथ मे हिंसक जंगली जानवर को आदमघोर घोषित कर उसके संहार के आदेश पारित करना और मुआवजा आवंटित करना ही है। बाकी वह वन्य जन्तुओं के संरक्षण हेतु केंद्र सरकार के अधिनियम व कानूनों का पालन करने के लिये बाध्य है। जबकि होना यह चाहिए प्रत्येक राज्य की परिस्थिति के अनुकूल इस अधिनयम को लचीला बनाया जाना चाहिए। मसलन आज उत्तराखण्ड में कोई गाँव या बस्ती ऐसी नहीं जिसके इर्द – गिर्द बाघ, तेंदुआ या चीता न दिखायी दे । पहाड़ के अधिसंख्य गाँव आज इनके खौफ में जी रहे हैं। प्रायः हर दूसरे – तीसरे दिन बाघ के हमले की खबर सुनायी देती है। पालतू पशुओं पर इनके हमले की तो अब खबर भी नहीं बनती । तब ऐसे हालात में क्या ग्रामीणों को इनके गाँव में घुसने पर आत्मरक्षा का अधिकार नहीं मिलना चाहिए ? अफसोस इस बात का है कि नियम इतने कठोर हैं कि आदमी बाघ को मारे तो बिना वेल के जेल और बाघ आदमी को मारे तो सरकार का मुआवजे का खेल । अब ऐसी हालात में आदमी करें भी तो क्या ? पलायन के अतिरिक्त वह और कर भी क्या सकता है।
सरकार को चाहिए कि अब वक्त आ गया है कि हिंसक जंगली जानवरों के संरक्षण के साथ वह आम लोगो का इनसे संरक्षण के लिये भी कदम उठाये । अन्यथा एक समय ऐसा आ सकता है जब लोग अपने बचाव हेतु स्वयं ही ऐसे जंगली जानवरों को ठिकाने लगाने में नहीं हिचकिचायेंगे । आखिर कैसे कब तक कोई अपने कलेजे के टुकड़ों को या अपने सगे सम्बन्धियों को इस तरह बाघ के मुँह में जाते देख सकते हैं? आखिर कब तक ?
= बिमल नेगी

