कथाकार – डॉ० कुटज भारती (जगदम्बा कोटनाला )
हमारा गढ़वाळमा एक इनि प्रथा छ कि क्वी भी ब्वारि अप्फू से बड़ा नाता-रिश्ता वळा मनखि को नाम नि लेंदि। आज बि गौंमा संस्कारित ब्यारि-मारि अफु से बड़ा को नौ लेणमा हिचकचांदी छन अर वूंका नौ को समानार्थी शब्द खुज्ये कि बुल्दन। यख तक कि अमुख आदिम का नाम का पैला अक्षर कु उच्चारण भी इनि ब्यारि-मारि नि करदन। खास करी सास-ससुरा अर जिठणा नौ त बिल्कुल बि नि लेंदी छै।
या भौत साल पैलि कि बात छ। इनि एक परिवार का ससुर कू नाम कुत्तु रौत (करतार सिंह रावत) जिठाणों कू नाम बागसिंह, जिटाणि कु नाम धुत्ती (गुड़्ड़ी) अर सासु कू नाम गदौंरि (गोदाम्बरी) छयो। वूंका सबसे छुट्टा नौना की ब्वारि दौंळि (दौंलि) ब्यखुनिदां छन्निमा गौड़ि तैं पिजाणि छै। रूमकां बाघ कुक्कर का जूग लग्यूं रै। मौका पाण पर वेन कुक्कर झपगै देे। कुक्करन् क्यूं-क्यूं त करि छ पर वे टैम पर कैन झटपट कुक्कर नि छुड़ै सकि। कुक्कर तैं बाघ धट-गदन्यां का तरफां ली गे।
ब्वारि दाैंलिन् चितै दे पर क्या कार? गौड़ि पिजाण बटि उठदि त दूध को ड़िगचामा गौड़ि़ लत्ति लगांदि अर उनै कुक्कर बिगर सुन्ताल हूणी छै। आखिर अधा गौड़ि पिजयांमा ही दौंलि उठि अर जोर की धै लगैन-‘ हे जी! हे जी!‘ पर अगनै ब्वाारि की बाच अड़गि गे। बोलु त क्या बोलु? बाच अड़गण कु कारण छयो कि ब्वारि दौलि तै कुक्कर बुन्नमा ससुर कु नाम (कुत्तु रौत) औंदु छौ। कुछ देर चुप रैकि ब्वारिन् फिर जोर कि धै लगेन- ‘हे जी! हे जी! भुकण्यां तै धुरण्यां ली गै।‘ (भुकण्यां-कुक्कर, धुरण्यां – बाघ।) सासुन् धै त सूणि छन पर जरा भड़कां सि। ‘हे ब्वारि! क्या ह्वे कुक्कर तैं?’ सासुन् पूछि। ‘बुनै भुकण्यां तैं घुरण्यां ली गे।‘ कनै लीगे? हे ब्वाई..क्या कन अब? को छुड़ालु? हे ब्वारि बुन्नि क्यों नि छै? कनै लीग बाघ कुक्कर तैं? सासुन् अपड़ि परेशानि व्यक्त करि। पर बिचरि ब्वारि की परेशानि को बींग?
इनै सासु धै लगै कि पुछणि उनै कुक्कर की ज्यान संकटमा अर धट-गदन्यां बुन्नमा भी जिठणी धुत्ती अर सासु गदौंरि कू नाम औंदुं छौ। यीं अदोल-धदोंलमा देर ह्वेगे अर बाघ कुक्कर तै धट-गदन्या (पनचक्की का गदेरा) का पार ली गै।
अब ब्वारि करो त क्या करो? वूंकि समझमा नि औणू छौ कि क्या बोलु? वींन भौत दिमाग लगै अर आखिर ब्वारि दौलिं का गौलामा अड़गी बाच फक्क भैर निकलीऽ गे-हे जी! हे जी! बुनैं भुकण्यां तैं धुरण्यां ली गे, रिगण्यां (घट) उन्द तरण्यां (गदन्या-नदी) पार।‘ पर अब क्या कन्नु छौ? अबरि तक त कुक्कर का पराण पखेरू रिगण्यां का तरण्यां पार से भी दूर ‘बैतरणी‘ पार करि गे छया। इतगा देर बाद सूचना मिलण पर सासू-ससुरा कपाळ पकड़ी रै गेनी।




