लोक भाषा

सबसि म्यारा मोती ढांगा, तीलै धारू बोला….

गढ़वाली गीतों मा पटवजि....

लेखक – चिन्मय सायर         

जन्म – 1948  निधन – 2016 (ग्राम – अन्दरसौं रिखणीखाल, पौड़ी गढ़वाल )

सूत्र वाक्यांशः तीले धारू बोलऽ’

तीले धारू बोला…’ गीतूंमा गलत पटबाजी छः अयाळ” श्री वीरेन्द्र पंवार जी को यु लेख,उत्तराखंण्ड खबर सार, 15 फरवरी 2001 पृष्ठम पाढ़। (ये पोर्टल पर यु लेख पिछल्या दिनू ‘हमुन जैई बल्दौ पैनु सिंग काय, वेन हम पर  घपगताल लगाया ‘ नौ से छपी छौ )

लेख मा अयाळ जी को संक्षिप्त परिचय, वूं कि काव्य जात्रौ वर्णन अर कुछ बिचार बि छाया। बिचारोंम लेख को शीर्षक बि छौ अर,लेख का बीचो-बीच प्रसिद्ध चित्राकार श्री बी0मोहन नेगी अर श्री रघुवीर सिंह अयाळ जी को चित्ताकर्षक चित्र बि छौ। चित्राम टंग्यां थैला, झगला, तेल, साबुण, शैम्पू व प्रसाधनादि की सामग्री सि दिखेणी छै। अर कबि अर चित्राकार द्वी मनीष्यों बीचम क्याळौं क झुंटा…भाई, तब- ’तीले धारू बोलऽ……

अगर हम लेख तैं ध्यान से पढौं अर द्यखों त् हम सणी महसूस ह्वालु कि लेखौ शीर्षक,लेखै विषय वस्तु,लेखमा प्रकाशित चित्रा अर स्थान परस्पर मेल नि खांणा छन। पण, यु ये सूत्रा वाक्यांशः’तीले धारू बोलऽ’ की ही व्यंजनात्मक शक्ति छ। जु यूं अणमेलूंम यनु मेल मिलै दि कि लेख तैं पैढ़ि कन सहसा हि वाणी से प्रस्फुटित ह्वे जाणू कि वाह ! तीले धारू बोलै झम्म ! (’झम्म’ बकै तैं रसिकों को रोक सक्द !) वास्तवम, तीले धारू बोलऽ’ पट बि छ अर नि बि छ, पण यु निरर्थक नी। यै वाक्यांशम अर्थानेक भ्वर्यां छन। यु गढ़वाली भाषा व लोक गीतों को सूक्त वाक्य छ। जो कबि-कबि लोकोक्ति क रूपम बि प्रयुक्त हून्द। बल्कि,बौत बरीकी से भाषै बचल्यात सुणे जा त् अजकाल लोग ये थैं मुहावरा रूप म बि प्रयोग कना छन।

हम तैं गर्व छ कि तमाम भाषाओं म केवल ’तीले धारू बोलऽ’ ही यनु वाक्यांश छ कि जु एक ही दगड़ सूक्ति, लोकोक्ति, मुहावरा व व्यंजनात्मक वाक्यांश छ। ये कु मुख्य गुण विचारौं तैं गठ्यांणु छ। ये वास्त यु सूत्र वाक्य बि छ। ये को उदाहरण श्री वीरेन्द्र पंवार जी को ही लेख छ। त् ब्वालो ’तीले धारू बोलऽ…’ अपड़ी बात तैं पुष्ट कना खुण, अब हम ये का बनि-बनि का रूप द्यखदां…….

1. अभिधर्थ – ’तीले धारू बोलऽ’ को शाब्दिक अर्थ कर्दो त् साफ छ, कि तीले= (तुमुन) तुमुल; धारू=धारम, बोलऽ=वाल छ अर्थात तुमन धार म बोलि छौ’..कि….. कुछ बि। जु एक प्रेमी अपड़ी प्रेमिका खुण या एक प्रेमिका अपड़ प्रेमी खुण बोल सकद।

2. मुहावरम – अजकाल नेतौं सणी प्रजातंत्र तीलै धारू बोेलऽ ह्वेगे’ अर्थात नेतौं खुण प्रजातंत्र मखौल (मजाक) ह्वेगे। ये वाक्यम ’तीले धारू बोलऽ’ वाक्यांश क रूपम प्रयुक्त छ। यु ये वाक्यम व्यंग्यात्मक चमत्कार उत्पन्न कनू। ये ई वैचित्रय क कारण यु मुहावरा ह्वेगे।

3. लोकोक्तिम – लोकोक्ति को प्रयोग स्वतंत्रा कथन क रूपमा हूंद। यु वाक्य-सौंदर्य दगड़ा-दगड़ी विचार पुष्टि बि कर्द। जन
”सबसे म्यरा मोति ढांॅगा तीले धारू बोलऽ
सबसे म्यारू मोति ढांगा।
दस रूप्यऽ को मोती ढांगू
दस रूप्यऽ को मोती ढांगू
सौ रूप्यऽ को सींगा
सबसे म्यारू मोति ढांगा,तीले धारू बोलऽ

उपर्युक्त गीत की पैलि द्वी पंगत्योंम म्वरण्यां मोती ढांगै बीतगे जवानी ओर (छोड़) इंगित कन्-’तीले धारू बोलऽ’ याने कि खंडहर बताणा छन कि इमारत कबि बुलन्द छै अर्थात मोती भले ही अब म्वर्यूं ढ़ांगु ह्वेगे पर कब्बि अंछू को प्रसिद्ध सांड छौ।
पैथरे तीन पंग्तियोंम-मोती को शरीर जरजर जरूर ह्वेगे पर वेकै सिंगै सिंग्वात अजि बि शौर्य अर सौंदर्य की अद्भुत मिशाल छन। अब, भले ही वे की कीमत मात्रा 10 रुप्य ही होली पण वेकी सिंगै सिंग्वात देखिकन क्वी बि गळदार 100 रुप्या दे सक्द-ईं बात को समर्थन छ कनू यखम’तीले धारू बोलऽ।

4. सूक्त रूपम – प्रायः सूक्यिोंम गेयता होन्द। यु सुन्दर चित्ताकर्षक कथन हुन्दी। युंम अभिधार्थ अर भावार्थ द्वी प्रकट ह्वे सकदीं-सूक्त रूपम-तीले धारू बोलऽ टनाटन छ। द्यखो,ये खुदेड़ गीतम
’तीले धारू बोलै बसन्ती ये
तीलै धारू बोलै य।
मिल परदेश जाण बसन्ती ये
तिल रूसै जाणै य।।”

उपर्युक्त गीतम य स्पष्ट छ कि- हे प्यारी बसन्ती(या बसन्त ऋतु) तिल धारम( या धारों म) बोलि छौ कि मिल (मिन) परदेश चलिजाण अर तिल (तुमुल/तुमुन) रूसै (रूठ/खौलै) जाण याने वियोगम तड़फणू रैंण। आशय यो छ कि मि परदेश जाणू वळु छौ ये वास्त वादा क मुताबिक एक दा फिर मी मीलि जै। त, युं पंग्तियोंम गेयता बि छ। अन्य पं.ग्तियों को भावार्थ कनाम बि सहायक हूणा छन अर अपरू बि विशिष्ट अर्थ ध्वनित कना छन अर अनुप्रास क माध्यम से सौंदर्य बृद्धि बि हूणी। याने कि सूक्त रूप म बि प्रयुक्त हूणू।

5. दार्शनिक अर्थम – ’तीले धारू बोल’=तीले=तिल क याने तीसरा तिल = तीसरी आंख = शिवनेत्रा = ज्ञान चक्षु अर्थात आज्ञा चक्र जो ’धारू’धार मंे अर्थात दोनों भहों के मध्य की बीच धार ऊपर स्थित छ । अर ’बोलऽ’=बोलणू छ=गुंजणू माने शब्द=शब्द जु ब्रह्म योगियों तैं ध्यान एकाग्र करण पर दर्शन दींद। त ब्वालो भाय’=तीले धारू बोलै……… झम्म’।
अब,आप तैं बतै दींदु,कि लगभग आठ दस साल पैलै भाई लोकेश नवानी जी धाद म चुंगन्य नौ से तीलै धारू बोलै…….. तहत कुछ व्यंग लिखदा छा। त् वूं दिन लोकेश जीन मि थैं बि पूछि छौ कि ’तीलै धारू बोलै’ को ठीक-ठीक अर्थ क्य होलो ? त् मिन वूं तैं शब्दार्थ ही बतै छौ। वेका बाद अब वीरेन्द्र पंवार का ये लेखना ही ’तीले धारू बोल’ पर कुछ सोचण अर लेखणा कु प्रोत्साहित करि। मि लेखक श्री पंवार जी अर संपादक श्री विमल नेगी जी को आभारी छौं जौं कि अभिव्यक्तिमयी कृपा से मि बि -’तीलै धारू बोल.ऽ…’..

आखिरम, क्षमा याचना दगड़ कि मी लाट से क्वी गल्ती ह्वेगे होली त् माफ कर्यां । वन बि मि रिखणीखाल को छौं। म्यारू ध्यान साहित्या तर्फ कम ही रैंद। मि सरकारै आर्थिक तंग हालत पर ही बिंडी ध्यान दींदु। बिशेषकर केन्द्र अर राज्य सरकारै बित्त बिभाग तैं मजबूत कना बान प्रयासरत रैन्दू। ये वास्ता, आपसे बि मेरी बिनती छ कि आप बि मी जन देश-भक्त बणणा कोशिश करीं अर सरकार की चिन्ता अपड़ी चिन्ता (चिता) समझीं। किलै कि-

सरकार बि देणी छ बोतळ पर अटूट ध्यान।
किलै कि बोतळ बगैर,सुखणी वीं की जान।।       सुखणी छ वीं की जान, बोतळ छ पैसा को र्याड़ा। अर,पैंसोैं क पुटग रंदी, रे ! विकास क जाड़ा। सायर जी तबी त् हमन बि पीणऽ की ठैर्याल। उन्नत ह्वा देश,ये वास्त , पाकेटम बोतळ धैर्याल।

येक छोड़ ठ्यका प्वड़णा छन। हैंका छोड़ नशाबंदी
– ’तीलै धारू बोल.ऽ…………’

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