हे मेरि पाणी कि नवळी हे…. जलनायक बन बच्चों ने गाँव के धारे को पुनर्जीवन दिया
अब बदली - बदली सी नजर आती है कण्डारी गाँव के धारे की तस्वीर

उत्तरकाशी। 1 जून, 2026
बच्चों को यदि प्रेरित किया जाय तो कभी – कभी वह ऐसा काम भी कर देते हैं जिसे करने के बारे में बड़े – बुजुर्ग सोचते ही रह जाते हैं। ऐसा ही एक काम किया है उत्तरकाशी के कण्डारी गाँव के बच्चों ने। उन्हें इस काम के लिये प्रेरित करने वाले रचनाधर्मी शिक्षक हैं सुरक्षा रावत ।
जब अधिकांश बच्चे विद्यालयी अवकाश का आनंद ले रहे थे, तब उत्तरकाशी जनपद के नौगांव विकासखंड स्थित इस कण्डारी गांव के कुछ जागरूक बच्चों ने अपने अवकाश को समाज और प्रकृति के नाम समर्पित कर एक प्रेरणादायी मिसाल प्रस्तुत की। बच्चों के सामूहिक श्रम, समर्पण और पर्यावरण प्रेम ने गांव के एक उपेक्षित पारम्परिक धारे को पुनः जीवन प्रदान कर दिया।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति सदैव सक्रिय शिक्षक सुरक्षा रावत के मार्गदर्शन में बच्चों ने कई दिनों तक निरंतर श्रमदान करते हुए धारे की साफ-सफाई, मरम्मत, पशुओं के लिए जल कुंड, सौंदर्यीकरण एवं आसपास स्वच्छता अभियान संचालित किया। इस अभियान की विशेषता केवल श्रमदान तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चों ने वृक्षारोपण, धारा-पूजन तथा उत्तराखंड की पारम्परिक लोककला ऐपण से धारे को सजाकर जल संरक्षण को संस्कृति और परम्परा से जोड़ने का सराहनीय प्रयास भी किया।
आज यह धारा न केवल स्वच्छ और सुंदर रूप में पुनर्जीवित हुआ है, बल्कि गांव में पर्यावरण जागरूकता और सामुदायिक सहभागिता का प्रतीक बन गया है। 
इस अभिनव अभियान में स्थानीय राजकीय प्राथमिक विद्यालय एवं राजकीय इंटर कॉलेज कण्डारी के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। सिमरन, अंशिका, ऋषिका, रिया, साक्षी, आयुषी, अंशुल, शिवांश, किशन, ऋषभ, हर्ष, वैष्णवी, जानवी, शिवन्या, मासूम एवं श्रुति सहित अनेक बच्चों ने श्रमदान कर इस कार्य को सफल बनाया। वहीं स्थानीय मुंबई प्रवासी प्रतिष्ठित व्यवसायी सुभाष गौड़, विद्यालय के प्रधानाचार्य नरेश रावत एवं सोहनलाल का सहयोग भी उल्लेखनीय रहा।
इस पहल की एक विशेष और भावनात्मक झलक तब देखने को मिली जब छात्रा रिया ने अपने जन्मदिवस के अवसर पर धारे के समीप पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। यह लगातार दूसरा वर्ष है जब उसने अपने जन्मदिन को प्रकृति के नाम समर्पित किया है। 
उल्लेखनीय है कि शिक्षक सुरक्षा रावत पिछले कई वर्षों से बच्चों को केवल पुस्तकीय शिक्षा तक सीमित न रखकर उन्हें प्रकृति, जल स्रोतों, लोक संस्कृति और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। उनकी यह अनूठी पहल इस बात का उदाहरण है कि यदि बच्चों को सही दिशा और प्रेरणा मिले तो वे समाज में सकारात्मक परिवर्तन के प्रभावी वाहक बन सकते हैं।
बच्चों के उत्साह और समर्पण से अभिभूत होकर सुरक्षा रावत ने उन्हें “जल नायक” की संज्ञा देते हुए कहा कि “पारम्परिक जल स्रोत केवल पानी के स्रोत नहीं हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर हैं। इनके संरक्षण की जिम्मेदारी हम सभी की है।”
उन्होंने बताया कि उनके द्वारा संचालित “कल के लिए जल अभियान” के अंतर्गत भविष्य में भी विभिन्न गांवों में जनसहभागिता आधारित ऐसे अभियान चलाए जाएंगे, ताकि पारम्परिक जल स्रोतों का संरक्षण हो तथा नई पीढ़ी प्रकृति, संस्कृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बन सके। 
यह पहल सिद्ध करती है कि जब शिक्षक की प्रेरणा और बच्चों का उत्साह एक साथ जुड़ते हैं, तो बदलाव की एक छोटी-सी शुरुआत भी समाज के लिए बड़ी प्रेरणा बन जाती है।

