गंगा – जमुना मैती देशै भाषा गढ़वाळि एक समृद्ध भाषा छ
हमारा अपणा लोग ही धुरयोणा छन अपणि भाषा
गढ़वाल मण्डल दिनांक : 11 सितम्बर, 2025
आलेख : सत्य प्रसाद रतूड़ी
मध्य हिमालयमा स्थित गढ़वाळ जै तैं पैलि केदारखण्ड, उत्तराखंड आदि का नौं से जणैं जांदो छौ अर जै को विस्तार बादमा गढ़ राज्य का नौं से चमोली, उत्तरकाशी से लेकि पौड़ी, टीरी होइकि देहरादून से भी अग्वाड़ी हरिद्वार-मंगलौर तक छौ, ये सारा क्षेत्रा का रहण वाळों की बोली भाषा गढ़वाळि हि छै । वा अब विशेष करीक पर्वतीय क्षेत्रामा ही बुले अर लिखे जांदी। उनो गढ़वाळि बुलण ,लिखण वळा देश का हर कोंणमा मिल जाला। गढ़वाळि को पुराणो लोक साहित्य गीत-पवाड़ा, कथा-वार्ता, नाटक आदि का रूपमा खूब सम्पन्न छ। आज त् गढ़वाळि भाषामा सभी तरौं की, सबि विषयों की रचना देखण-पढ़णक मिली जांदीन-अर आप तैं बतई द्यूं कि गढ़वाळि राजमहल से लीक छ्वटि सी कुटिया-झोपड़ी तक बोल्ये जांदी छै अर वा छ्वटा बड़ा सबकी अपणी भाषा बोली छ।
इनो बोल्ये जांदो कि बेदों की रचना अर कति धार्मिक पुस्तकों का लेखन का दगड़ि ज्योतिष की किताबु का लिख्वार अधिकतर गढ़वाल की तपो भूमिमा ह्वेनि। हमारी हिन्दी, ब्रजभाषा का पुराणा मण्यां कवि स्वामी शशधर, मोलाराम, महाराजा सुदर्शन शाह आदि की जन्म भूमि भी गढ़वाल ही छ अर यूं कवियों की कविताओंमा बि गढ़वाळि शब्द को प्रयोग मिलदु छ। जनु स्वामी शशधर (ज्यों को टैम 1750 से 1825 मण्यै जांदा) की कवितामा – कायाकर निकर सुख राम मजि
भक्ति मन आत्मा जागला
येति निजनाम सेवा खिळांणि
भवाव्धि की बेड़ पार लागला
अर महाराजा सुदर्शन शाह का ब्रज भाषा का काव्यमां वूंकी कविता का शुरू-शुरू का शब्द गढ़वाळि का छन –
ईश्वर न जब रूप दिने
तब समझ नी दीनी
जब समझ दीनी
तब धन नी दीन्यो।
सु यूं पंग्तियों से साफ मालूम होई जांदो कि गढ़वाळी तबरी बि कतना प्रभावशाली छै। अर या त् शुरू का दिनूं कि छ्वीं छ। बादमा त् फिर गढ़वाळीमा ही खूब कविता लिखेणी लगि गेनि।
गढ़वळि भाषामा लिख्यूं इतिहास गढ़वळि भाषा माण्यां विद्वान अबोध बन्धु बहुगुणा जीन अपणी किताब ’गाड मेटीक गंगा’ अर ’शैल वाणी‘ मा खूब विस्तार से दिन्यूं छ। वूं का ही शब्दुमा-”काव्य साहित्य का ये नया स्फुरणमां गढ़वळि काव्यों न पैली दौं अपणी जातीय संस्कृति कि रक्षा कर्न लै, अनुमूल्यों सणि अभिव्यक्ति देण वाळि अपणी भाषा की समर्थ को ज्ञान ह्वे अर वूंन जनजीवन सणी यीं नव चेतना से अनुप्राणित करे कि प्रादेशिक बोलि अर भाषा अपणि अभिव्यंजना शक्ति से सम्पन्न बण सकदन। ईं तरौं पर गढ़वळि गिरा से कव्य का संदेश देणु तैं एक त्रिमूर्ति प्रगट होये-पं0 हरिकृष्ण जी दोर्गादात्रि रूडोला, पं0 लीला दत्त जी कोटनाला अर महन्त हर्षपुरी गुसांई का रूपमा। इ तिन्नी देशप्रेमी श्रीनगर का निवासी छा अर यूंन अपणु रचनात्मक कार्य समाज का उद्धार का वास्ता करि छौ। यूं को यु अभियान सन् 1875 ई0 का धोरा प्रारम्भ ह्वे छौ“।
यूं तिन्यूंन गढ़वळिमा बड़ि बढ़िया कविता लिखणौं को एक अभियान-सी शुरू करे। वन देख्या जाव त् गढ़वळि भाषा लेखन को शुभारम्भ आज से करीब द्वी सौ वर्ष पैले ह्वे ग्ये छौ। गढ़वाळियूें कि जिकुड़ी की धड़कन बणी ग्ये छै।
श्री अबोध बन्धु जी का शब्दोंमा बर्तमानमा, गंगा जमुना का मैती प्रदेश (गढ़वाळ) की ज्वा सर्वजनीन भाषा छ वा गढ़वळि छ। गढ़वाळी सांख्योंमा, पुरणा गीत, पवाड़ा, कथा, लोकनाट्य आदि विधाओंमा समृद्ध लोक साहित्य उपलब्ध छ। साथ ही वींमा आज काफी साहित्य भी मौजूद छ। साहित्य की सबि विधाओं मद्ये पद्य रूपमा उद्भूत काव्य अधिक छ अर वो लोकप्रिय होणअ का साथ ही सारवान भी छ। ये बहुमुखी काव्य की विपुल उपलब्धि जै महत्वपूर्ण सांस्कृतिक चेतना जतलौंद एवं जै बिशेष दिशा ज्ञान प्रदान कर्द वां का मुताबिक आज गढ़वळि काव्य ही मध्य हिमालै का ये प्रदेश को प्रतिनिधित्व कर्र्द अर पर्वतवास्यों की वई वाणी शैल वाणी छ। ईं शैलवाणीमा ही वख उलार्या पराण्यों की खितकणी अर क्वांसि जिकुड़यों की खौरि प्रकट हुई छन। यांमा गढ़वाळ्यूं का जलम,जीवन अर मरण को विवरण छ।”
गढ़वळि एक समृद्ध भाषा छ अर वींको शब्द भंडार भी भरपूर छ साथ ही वा बड़ी मधुर लालित्यपूर्ण छ, ब्रजभाषा की तरौं ,कर्कशता से मुक्त। पिछल्या दिनु पौड़ी बटि ’स्वाधीन संग्राम में गढ़वाल‘ नौं से एक स्मारिका निकळि छै। वीं मा ’गढ़वाली भाषा एवं साहित्य‘ का बारामा लेख छपे छौ डा0 श्यामधर तिवारी जी को। जु बड़ो खोजपूर्ण अर बड़ो सुन्दर पठनीय छौ। वे मा श्री तिवारी जीन लिखी- ”गढ़वाली भाषा शब्द सम्पदा की दृष्टि से समृद्ध है। इसमें वैदिक, लौकिक, संस्कृत, तत्सम, अर्धतत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्द मौजूद हैं। इस भूमि ने राजनीतिक कारणों, व्यावसायिक स्थितियो,ं ऐतिहासिक कारणो, अनेक जातियों के आगमनों, तीर्थयात्रियों-पर्यटकों, ऋषियों के कारण जहां विभिन्न सामाजिक संस्कृतियों को जन्म दिया, वहीं पर भाषा के आधार पर गढ़वाली भाषा को समृद्ध किया। यहां पर प्रारम्भ में जिस प्रकार कोल-किरात, खश, द्रविड़, हूंण, शक, गुर्जर, नाग, आर्य आदि कई जातियों का प्रवेश हुआ उनसे सम्बन्धित भाषाओं के शब्द आज भी गढ़वाली भाषा में विद्यमान हैं। उसी प्रकार राजस्थानी, मराठी ब्रज अवधी, बिहारी, बंगला, नेपाली, सिंहली, पंजाबी आदि के शब्द भी गढ़वाली भाषा में समाविष्ट हैं इसका कारण सत्य प्रसाद रतूड़ी की दृष्टि में यह है कि गढ़वाल की संस्कृति में समस्त भारत की संस्कृति आकर समा गई ।
विद्वानों ने गढ़वाली भाषा की अनेक विशेषतायें बतायीं हैं। यह भाष शब्द भंडार की दृष्टि से समृद्ध हैं। इससे सूक्ष्म अर्थ-भेद की अभिव्यक्ति क्षमता है। इसका अपना व्याकरण और कोश है। इसमें विविध भाषाओं के शब्द सम्मिलित हैं ।लिपि देवनागरी है। इस भाषा के कुछ शब्द ऐसे हैं जिनके सम्मुख हिन्दी में शब्द नहीं हैं जैसे गढ़वाली के दिदा-भुली और दीदी-भुली के शब्द हिन्दी में नहीं हैं।“
त् साफ ह्वेगे , हर तरौं से सिद्ध ह्वेगे कि गढ़वाली भाषा एक समृद्ध भाषा छ। वीं की विकास की प्रक्रियान यू भी साबित करी दिने कि वा प्रगतिशील छ, साथ ही वा बड़ी सरल भी। क्वी बि साधारण हिन्दी को जानकार द्वी-तीन महीनामा ही गढ़वळि सणी सीखी सकदो, खूब लिखी-पढ़ी सकदो। मैंन टिहरी अर उत्तरकाशीमा अपणा कई व्यापारी बंधुओं, पंजाबी भाइयांें तैं बड़ी अच्छी गढ़वाळि बोलदु सुणें-भाषा त् जोड़दी छ,अपणत्व पैदा करदी।
मसूरीमा त् विदेश का रण वळा कई बंधु गढ़वाळि सीखणु कु उत्सुक दिखेंदन । एक अमरीकी बन्धु पीटर नौं को सज्जन खुद मैं मुं आये अर वैंन गढ़वाळि का प्रति बड़ो लगाव दिखाये वु हिन्दी त् खूब जाणदु छौ, मैं से कई गढ़वाळि भाषाकी किताबी लीगे पढ़णू तैं ।
देहरादून जईक कुछ गढ़वाळि किताबी खरीदी बि ल्याही। मैं तैं गुरू बणैकि एक-द्वी कीमती किताबी भेंट भी करी ग्ये। भाषा को भविष्य त् उज्जवळ छ, पर कमी त् हममा हि छ। हमरा कुछ बड़ा लोग अपणा मंत्रि विशेष पढ़ियां-लिख्यां लोग ही गढ़वाली बोलण-लिखणमा अबि बि झिझकणा छन,। कई त् हिन्दी से बि जादा अंग्रेजी का मोह से ग्रस्त छन।
( उत्तराखण्ड खबर सार – 15 दिसम्बर, 2000 )
लेखका बारा मा-
दिवंगत सत्य प्रसाद रतूड़ी हिमाचल साप्ताहिक और मसूरी टाइम्स के संपादक थे और उन्होंने उत्तराखंड पर कई किताबें लिखीं – गढ़वाल गाथा, धरती का जन्म, हमारा गढ़वाल और टिहरी के जन संघर्ष की स्वर्णिम गाथा। जब 2006 में 98 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हुई, तब वह अपनी आत्मकथा ‘एक पत्र और पत्रकार की कहानी’ लिख रहे थे। भले ही वह अपनी किताब पूरी नहीं कर सके, लेकिन उनकी विरासत उनके लेखन के माध्यम से जीवित है।



