उत्तराखंड

टनल से बाईपास पौड़ी का भविष्य क्या सुधरेगा

प्रस्तावित टनल के ऊपरी हिस्से के रहवासियों ने शुरू किया विरोध

पौड़ी : दिनांक 2 दिसम्बर, 2025

पौड़ी को राष्ट्रीय राजमार्ग से वाईपास किये जाने के निर्णय से पौड़ी में लोगों की मिश्रित प्रतिक्रियाएं  हैं। पौड़ी नगर में एन० एच० चौड़ीकरण से प्रभावित होने वाले लोगों का खुश होना लाजिमी है। प्रशासन और हमारे जनप्रतिनिधि भी खुश हैं। पौड़ी के हितधारकों के समर्थन को देखते हुए तो अब यही लगता है कि पौड़ी के अधिसंख्य लोग खुश हैं। बैठक में लिये गये निर्णय को देखते हुए अब यह मान लिया गया है कि पौड़ी इस राष्ट्रीय राजमार्ग से दरकिनार (वाईपास) हो ही जायेगा। फिर भी नगर में अनेक लोग ऐसे हैं जो एन० एच० की इस बाईपास टनल को दूसरे नजरिये से भी देखते हैं।

इधर, गत 26 नवम्बर को सम्बन्धित बैठक की खबर बाहर निकलते ही क्षेत्रीय उन लोगों ने विरोध शुरू कर दिया है जो इस टनल के निर्माण से प्रभावित होने की आशंका से त्रस्त हैं। उन्होंने जिलाधिकारी गढ़वाल को भी एक ज्ञापन देकर इस टनल का विरोध किया है। विरोध करने वालों में पौड़ी नगर के नहीं बल्कि जहाँ से टनल गुजरेगी उसके ऊपर के तमाम रहवासी हैं। इनमें गहड़, सैंणखाल, बुआखाल निसणी (आंशिक) और गडोली के लोग शामिल हैं। इन तमाम लोगों ने कल बुआखाल में एकत्रित होकर एन० एच० के सहायक अभियन्ता का घेराव किया और प्रस्तावित टनल का विरोध किया ।

बताते चलें कि राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-534 के पैडुल–श्रीनगर खंड के मध्य पौड़ी बाईपास के रूप में घोड़ीखाल (पोर्टल-1) से प्रेमनगर (पोर्टल-2) तक प्रस्तावित 2100 मीटर लम्बी टनल प्रस्तावित है। प्रशासन ने इसके लिये हालाँकि कोई खुली जनसुनवाई नहीं की लेकिन गत 26 नवम्बर को एक बैठक कर यह बताया कि इस टनल को बनाने हेतु हितधारको ने अपनी सहमति दे दी है। अब जब बैठक में हितधारकों ने अपनी सहमति दे दी है तो ये विरोध करने वाले कौन लोग है? क्या इन्हें हितधारक नहीं समझा गया है। क्या सुरंग बनने से जिन लोगों को नुकसान की आशंका हो सकती है वे हितधारक नहीं हैं? और यदि हैं तो उन्हें बैठक या जनसुनवाई में शामिल क्यों नहीं किया गया।

विरोध करने वाले ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें इस बड़े प्रोजेक्ट की जानकारी सोशल मीडिया और समाचार पत्रों के माध्यम से मिली। संबंधित विभाग द्वारा उनको कोई सूचना नहीं दी गयी। उन्हें जनसुनवाई में भी शामिल नहीं किया गया। उनका कहना है कि यदि यह टनल बनती है तो भविष्य में उनके गांवों, कृषि भूमि, जल स्रोत और घरों पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। उनका यह भी कहना है कि टनल निर्माण के दौरान होने वाले भू-धंसाव, प्रदूषण और कंपन से क्षेत्र की भौगोलिक संरचना प्रभावित हो सकती है. ग्रामीणों ने सर्वे और प्रभाव आकलन रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है।  ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी बात नहीं मानी गयी तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

वास्तव मे एन० एच० से पौड़ी को वाईपास करना एक गम्भीर मुद्दा है। निश्चित ही नगर में सड़क चौड़ीकरण में अनेक लोगों के आशियाने जमींदोज होना निश्चित है। इसलिये हमारे जनप्रतिनिधियों ने शायद अपनी फजीहत से बचने के लिये इस वाईपास को स्वयं के बचाव के लिये एक अच्छा विकल्प मान कर इसे प्रस्तावित किया है। प्रशासन भी नगर में एन०एच० के चौड़ीकरण से होने वाले फसाद से दूर रहने का इसे एक अच्छा विकल्प मानता है। इसे प्रशासन का नगर में सड़क चौड़ीकरण से प्रभावित लोगों के प्रति संवेदनशीलता या साफ्ट कॉर्नर भी कह सकते हैं। हालाँकि इसके पीछे प्रशासन बढ़ते ट्रैफिक दबाब को कारण बता रहा है। फिर जनप्रतिनिधियों के प्रस्ताव का समर्थन करना भी उसकी मजबूरी है । इसलिये एन० एच० से पौड़ी को वाईपास करना लगभग लगभग फाइनल मानकर मामला डीपीआर के निकट जा पहुँचा है। लेकिन इस बीच अब यह विवाद सामने आने से मामला सुरंग में फंसता है या उससे बाहर निकलता है यह भविष्य के गर्भ में है।

वैसे जनप्रतिनिधि और प्रशासन जब एक होकर कोई निर्णय लेते है तो उसमें प्रायः पुनर्विचार की गुंजाइश कम ही रहती है। इस प्रकरण में भी यही लगता है कि विरोध करने वालों को समझा बुझा कर मामला शान्त कर दिया जायेगा। लेकिन सवाल फिर भी अपनी जगह है कि क्या पौड़ी को राष्ट्रीय राजमार्ग से वाईपास करना इतना जरूरी है? क्या इसके लिये एन० एच० के मानकों में कोई ढील नहीं दी जा सकती ? और अगर नहीं तो हमारे पास एकमात्र विकल्प क्या सुरंग ही है।

इस मुद्दे पर गम्भीरता से सोचने की जरूरत थी / है। घण्टाधार से प्रेमनगर विकल्प है लेकिन यहाँ एनजीटी ने पहरा बिठा रखा है। तो क्या एनजीटी में प्रत्यावेदन नहीं हो सकता ? एक अन्य विकल्प बुआखाल – मांडा खाल – गोडख्याखाल से सिंगोरी – कठूली – जाख होते हुए खण्डाह भी है।  कई लोगों का मानना है कि आज की परिस्थितयों को देखते हुए एन० एच० को शहर से दूर रखना ही ठीक है। वे मैदानी क्षेत्रों में बने बाईपास का उदाहरण देते हैं तो क्या इस पहाड़ी नगर जो आज मरणासन्न स्थिति में है उसे भी इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए।

चलो हम एन०एच० के बाईपास होने से टूरिज्म और व्यापार को होने वाले नुकसान पर चर्चा नहीं करते परन्तु क्या बुआखाल से पौड़ी या पौडी से प्रेमनगर तक सड़क थोड़ी सी चौड़ी नहीं होनी चाहिए। चलो मकानों को तोड़ने की भी बात नहीं करते लेकिन जहां पर गुंजाइश है क्या वहाँ भी चौडीकरण न करें । पौड़ी – बुआखाल तक सड़क दो चार फीट चौड़ी होने का इन्तजार पिछले छः सात दशकों से लोगों को है। इस बीच यहाँ वाहनों की संख्या दो चार सौ गुना बढ़ गयी लेकिन सड़क वहीं अटकी है जहाँ सन 1952 में थी। तो क्या ऐसा ही चलने दें । चलो शहरवासियों को एन० एच० नहीं चाहिए लेकिन क्या उनको इतना भी सुविधा नही मिलनी चाहिए कि सड़क दो चार फीट चौड़ी हो। अब यदि इस एन० एच० का विवाद बढ़ता है या फिर सुरंग बनती है तो फिर लम्बे समय के लिये यह सड़क सुधारीकरण सम्भव नहीं लगता । जबकि बुआखाल से पौड़ी या पौड़ी से प्रेमनगर तक सड़क सुधारीकरण की सख्त आवश्यकता है। सम्भव इसलिये नहीं क्यों कि एन० एच० तो सुरंग वाला हिस्सा होगा, तब वर्तमान में घोड़ीखाल से प्रेमनगर तक सड़क भी जो वर्तमान में एन० एच० के पास है उसी के पास रहेगी या फिर लोनिवि को हस्तान्तरित होगी ? और यदि होगी तो समय तो लगेगा। प्रशासन को चाहिए कि यदि सुरंग बनती है जैसा निर्णय लिया गया है तो घोड़ीखाल से प्रेमनगर तक सड़क सुधारीकरण का कार्य भी साथ – साथ ही पूरा करे ।

सुरंग बनने से निश्चित रूप से पौड़ी में ट्रैफिक का दबाब कम होगा लेकिन दीगर बात यह है कि आज कितना बड़ा दबाब है? एक तरफ पौड़ी के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। अवकाश के दिनों पौड़ी की सड़के बिल्कुल खाली जनशून्य रहती हैं। अब जो ट्रैफिक के दबाब की बात हो रही है वह सड़क की हालात सुधार कर या सड़क पर खड़े रहने वाले वाहनों का हटाकर कम किया जा सकता है। यदि एन० एच० के मानक न लागू करें और तोड़फोड़ भी न हो तब भी सड़क सुधारीकरण का कार्य तो पौड़ी के लिये बनता ही है। आज भी बुआखाल से घण्टाधार तक दो सौ मीटर के पैच पर लम्बे समय से पैचवर्क नहीं हो पाया है और वाहन इन गड्डों के ऊपर ही चलने को मजबूर हैं।

अब सुरंग बनाने या न बनाने का निर्णय तो प्रशासन व सरकार को करना है लेकिन पौड़ी नगर के हित में जो उचित हो इस पर तो गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है। दो दशक पूर्व प्रशासन / लो० नि० विभाग ने पाबौ के निकट चोपड्यूँ से प्रेमनगर तक टनल निर्माण प्रस्तवित किया था । इसके लिये सर्वे हेतु नेशनल स्तर पर बिडिंग भी हुयी थी लेकिन किसी भी कम्पनी /संस्था ने इसमें रुचि प्रदर्शित नहीं की थी। अब इस बार घोड़ीखाल से प्रेमनगर टनल प्रस्तावित है तो यह देखना दिलचस्प होगा कि यह कितना कामयाब होता है।

= बिमल नेगी

 

 

 

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