इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था
बादल फटने व भारी बारिश से उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली में तबाही

अगस्त 29, 2025
पौड़ी । अगस्त का महीना लगभग निकले जा रहा है । फिर भी आसमान है कि अभी भी आफत बन के बरसता जा रहा है। पहाड़ के लोग बारिश, बरसात के साथ आसमानी मुसीबतों को झेलने के सदियों से आदी रहे हैं लेकिन यह चौमासा पहाड़ के लिये इस कदर घाव पर घाव देता जा रहा है जिसकी पीड़ा पहाड़ वासी आने वाले लम्बे समय तक महसूस करेंगे। ऐसी बरसात को देखते हुए ही किसी शायर ( कतील सिफाई ) ने कहा है – दूर तक छाये हैं बादल और कहीं साया न था, इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था।
जी हाँ, आपको नहीं लगता इस साल कुछ ज्यादा ही हो रहा है। जम्बू कश्मीर से लेकर हिमाचल और उत्तराखण्ड ही नहीं देश के पूर्वात्तर राज्यों के हालात भी यहां से अलग नहीं हैं। अब पहाड़ो में हर साल इस तरह के जलप्रलय लगातार देखते को मिल रहे हैं। यहां बादल फटने, भूस्खलन होने, नदियों का जलस्तर बढने, कृत्रिम झीलें बनने, भारी बारिश से नदी नाले उफान पर आने, यातायात अवरुद्ध होने और इन सब के होने से भारी जन – धन हानि, पशुहनि और चौतरफा विनाश ही विनाश दिखायी देने से लोग स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। तो क्या इसके लिये केवल प्रकृति को ही दोषी मानकर किनारा कर लिया जाय या फिर हमें उन तमाम कारणों की जांच पड़ताल करनी चाहिए जो इस महाविनाश के लिये जिम्मेदार हैं।
सरकारें आती और जाती रहेंगी और यदि इस तरह प्रति वर्ष हो रहे पहाड़ो के विनाश पर गम्भीरता से विचार नहीं किया जायेगा तो विनाश का यह सिलमिला कभी थमेगा नहीं। निश्चित रूप से हमें पहाड़ में सुविधाएं बढ़ानी हैं तो विकास भी चाहिए । लेकिन क्या इस तरह के विनाश की कीमत पर हमें विकास चाहिए । एक तरफ विकास और दूसरी तरफ उसका परिणाम विनाश । तो क्या ऐसा चलता रहेगा । अगर अभी भी प्रकृति की इतनी चेतावनियों के बाद भी नहीं चेते तो इन्सान को अपने कारनामों की कीमत महाविनाश से चुकानी पड़ेगी। अच्छा होता यदि वर्ष 2013 में केदारनाथ जल प्रलय के बाद हमारी सरकार और नीति – नियन्ताओं ने कुछ सीख ली होती और कुछ इस तरह की नीतियां फारमुलेट की होती जिससे धीरे धीरे इस तरह की तबाहियों को या इसके प्रभाव को कम किया जा सकता । लेकिन ऐसा नहीं हो पाया । इसका नतीजा हमारे सामने है । धराली और थराली की तबाही को हमें नहीं भूलनी चाहिए। अच्छा होगा सरकार और नीति नियन्ता इन घटनाओं से सबक लेकर आगे की रणनीतियों पर विचार करें। नीतियां केवल उत्तराखण्ड के लिये ही नहीं पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिये बनायी जांय ताकि यहाँ के निवासियों को पलायन के लिये मजबूर न होना पडे और उनका पहाड़ों में भविष्य बचाया जा सके ।
हमारे वैज्ञानिक, भू -विशेषज्ञ, पर्यावरण विद् लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि हिमालय और खासकर मध्य हिमालय मेन सेन्ट्रल थ्रस्ट ( एम० सी० टी ०) जोन में है जहाँ विकास सम्बन्धी मानवीय हस्तक्षेप की न्यूनतम गुंजाइश है लेकिन हो ठीक इसके विपरीत रहा। हम सड़कों को ऑल वेदर बना रहे हैं । सुरंगे निकाल रहें हैं। वनों का कटान करने पर लगे हैं। नदियों का पानी रोक रहे हैं। डैम बनना हेतु बड़ी बड़ी मशीनों का प्रयोग कर रहे हैं और भारी विस्फोटों से पहाड़ को दहला रहे हैं। सरकार के साथ ठेकेदार, नेता, नौकरशाह मिलकर पहाड़ों का शोषण करने पर लगे हैं। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ में हम अपने धार्मिक स्थलों से छेड़छाड़ करने मे भी पीछे नहीं हैं। धारी देवी इसका उदाहरण है, जहाँ झील का पानी मन्दिर तल के दो चार फीट नीचे तक पहुंच गया है।
आज की ही बात करें तो आज सुबह से उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलो के कई स्थानों में बादल फटने, भारी भुस्खलन होने के साथ ही नदियों का जलस्तर बढ़ने और सड़के बन्द होने की ख़बरें आ रही हैं।
चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में बादल फटा है। जिसमें पति-पत्नी लापता हैं और दो लोग घायल हो गए, साथ ही 20 मवेशी मलबे में दबे हैं। वहीं टिहरी के भिलंगना ब्लॉक के गेंवाली गांव पर भी बादल फटा है। यहां से किसी भी प्रकार के जनहानि की सूचना नहीं है। इसके अलावा रुद्रप्रयाग में भी बादल फटा है। यहां जखोली ब्लॉक के छेनागाड़, बांगर सहित कई जगहों पर अतिवृष्टि से व्यापक नुकसान हुआ है।
बृहस्पतिवार को देर रात से हो रही तेज बारिश आज शुक्रवार सुबह तक भी जारी थी। बृहस्पतिवार रात को तहसील देवाल के मोपाटा में बादल फटने से भारी तबाही हुई है। कुछ घरों के मलबे में दबे होने की सूचना है। जिलाधिकारी संदीप तिवारी ने बताया कि मोपाटा में रहने वाले तारा सिंह और उनकी पत्नी लापता बताए जा रहे हैं। जबकि विक्रम सिंह और उनकी पत्नी घायल हुए हैं। इनके आवास और गोशाला के मलबे में दबने की सूचना है। इसमें 15 से 20 जानवर भी मलबे में दबने की सूचना है।
कर्णप्रयाग में मूसलाधार बारिश के चलते कालेश्वर में ऊपर पहाड़ से मलबा आया है जो लोगों के घरों में घुस गया। जेसीबी मशीन के द्वारा मलवा हटाने का प्रयास किया जा रहा है। इस दौरान पुलिस भी मौके पर मौजूद रही। अलकनंदा और पिंडर नदी का जलस्तर भी बढ़ गया है। कर्णप्रयाग के सुभाषनगर में पहाड़ी से बोल्डर और मलबा गिरने से सड़क बंद हो गई है।
रुद्रप्रयाग जिले के तहसील बसुकेदार के बड़ेथ तालजामन में बादल फटने की सूचना है। जानकारी के अनुसार कई घर और गोशालाये दब गई है इनमें कई मवेशी दबे है। रात को भीषण बारिश से लोग अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर भाग गये थे। अभी नुकसान का ठीक से पता नहीं चल पाया है।
धारी देवी के निकट बद्रीनाथ हाईवे जलमग्न हो गया है। पहाड़ों में हो रही मूसलाधार बारिश के चलते अलकनंदा का जलस्तर खतरे के निशान को छूने की कगार पर है। इस स्थान पर वाहनों की आवाजाही रोक दी गयी है। उधर समूचे प्रदेश में बारिश ने जनजीवन अस्तव्यस्त कर दिया है। राजमार्ग 07 पर बने धारी देवी मंदिर को अलकनंदा नदी का पानी छूने लगा है। मंदिर नदी के पानी से कुछ ही फुट नीचे बह रहा है। सिरोबगड़ के पास जीवीके की झील का पानी अब सड़क पर बहने लगा है और सड़क लगभग झील बन गई है। अभी इस जल स्तर के और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
इधर गंगोत्री नेशनल हाईवे भी भूस्खलन के कारण जगह जगह बन्द हो गया है। नेताला, पापड़गाड, बिष्णुपर, नलोता, बडेथी आदि स्थानों भू-स्खलन होने या सड़क पर मलवा आते से मार्ग अवरुद्ध बताया जा रहा है। हलाँकि प्रशासन की ओर से युद्धस्तर हाई वे खोलने के प्रयास जारी हैं। इन सभी घटनाओं पर आपदा प्रबन्धन विभाग और मुख्यमन्त्री धामी स्वयं मोर्चा संभाले हैं।
= बिमल नेगी





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