साहित्य व संस्कृति

जोगण रूप कुवंरि बसन्तदेई

गढ़वळि कथा

 

कथाकार – कमल रावत

खंडाह घाटी गडोला क सात मादेब द्युलों मा दांदणी को विश्वेश्वर मादेब सबमा भव्य अर दिव्य छ। दत्तात्रेय कि तपस्थली यो दैव स्थान चमराडा भेलगढ क पार ढौंढ धार रौंतेली जगा मा छ बणयुं। मादेब को आपलिंग शिवलिंग त्रिरथ द्युल क भितिर छ थरपयुं। द्युलै खोली पर गणेश दगड शिबजी सकुटुंब उकेरयां छन। इनै उन्नै तंग घटटी पौड़। ठीक वूनि जन क्वी ‘गढ’ होंद। तीन तरफां भेळ,उत्तरी ढलान हवादार रौंतेली जगा। पूर्वाभिमुखी द्युल क चर्री तरफां पंच देबता मुंडेला छन। जौंमा हनुमंत,नरसिंग, गणेश, खेत्रपाल बिराजयां छन। एक मा मां पार्वती ध्यानस्थ अवस्था मा छन। करिब चौबीस मुंडेला होला।हजार बरस पुराणो कत्युरी काल मा बंणयुं पुराणों द्युल ह्वेन यो। पटांगणा छोर बडो भारियु पुजित जौंळ पिफल- बड़ को जोडा छ। द्युल चर्री तरफां जमणो,खडिक,सेमल क जटाजूट वृक्ष छन।पंचवटी साधकों क वास्ता अति उत्तम मणेंगे।मातम छ कि सौ बरस कि तपस्या फल एक बरस मा मिलद । सुरजोदय कि पैली किरण शिबलिंग मु पोडद। दूर पश्चिम मा सुर्ज ब्याखुणियुं अस्त होंद दिखेंद। गुरु कोठा, धुन्ना,जुगिणि माईयुं कि भ्युंमुडा बगली अर बगल ऐंच बटे जाख कठुली जनै बटे बगि आंद गदरी । गदरी बी पूरब दिशा मा छ।कल कल बगद मिट्ठू पाणी। पाणी क नवला- नौ अर गौमुखी धारा बी नजिक छन। यख बटे एक बाठो जाख खोब जांद,हैक्को बाठो राजबाठा मिलिक गढछाळा ह्वेक राजधानी सिरीनगर जांद।सामणी पार डांडा सुमाडी बैरांगणा छ अर दूर पश्चिम मा चंद्रबदनी खडी धार दिखेंणी छ। यीं जगौ नौं दांदणी छ अर यख दांदणी मादेब मु राजधानी सिरीनगर चुलै गरम कम छ।सौंणा मैने सुरसुरी हवा छ बगणी।
पांच दिन बटे कुंवरि बसंतदेई को यखि दांदणी मादेब मु डेरो डलयुं छ। दगडा को धर्मी जत्था हुजुम वापस सिरीनगर बौड गे छौ। कुछेक जुगिणि माई यखि दांदणी मठ मा गुरूमाई मु रै गेंनि। राजाज्ञा अनुसार द्वि सिप्पै सुरक्षा वास्ता यख रै गेंन। देबता घौर क्यांकि डौर? पर राजाज्ञा छ। पच्चहतर वय कि गुरूमाई आजब्याली यखि मढ़ी चौमास काटणौ आयीं छन। गिच्चाआपर दांत निधन,पेट मा आंत निंन।मुंड पर सुफेद चांदी क लटुला।भगोया गाति पर नारंगी रंगा मनका माला अर रूद्राक्ष छ।गुरूमाई दगड़ चेली जमात बी आंण हि छै। बाली उमरै माई से ल्येकि बुढ बुढी माई। किल बिल किकलाट। सगर बगर फफराट। धुन्ना रमयुं छ। माई जुगिणी घेरी बैठीं छन।कथा गाथा लगणीं छन,रामैण माभारत क वृत्तांत चलणा छन। बिनसरि बटे गीता श्लोक पाठ पोढेणा। शिबजी मु पाणीं चढो। भोग बणांदरों को छुल्को अलग छ,पंदेरियुं कि लंगत्यार पाणी सरणीं ,चौका पोत्या वला अलग छन। घास लखडो बी आणों छ। जांदरी रिंगणी,गिंजाली बजणी। मठै अपणी खेती बाडी गुंठ भुमि छ। सेरा छन।खैकर सिरतानी मठा सेरा अदेल पर खेती करदन। नाज पाणी लोग सुखै सौकिक धर जांदन।गौ सेवा होंणी छ। शिबजी मु दूध बी त चडद।माईंयुं तैं गौ पालन को प्रावधान छैं छ। गौ सेवा दगड प्रभु सूमिरण दिनमान भर लगयुं छ।ढोलकी मंजिरी बजणी छन। शिबजी क गीत लगणा छन। चौमास झणणो छ। असधारी बगणी। एक सेक व्यंजन पकणा छन। पैतुड,पिनालू गुटका, रैठू, घुमणी, अमाणी, बाडी, ढुंगला, स्वाला, गुडजोली, झंगोरू  झोळी, फाणू, कफली, उजायीं मुंगरी, परसाद, लपसी। दिनमान भर तैको चढयुं छ। मादेब अर गुरूमाई खुणी भोग लगणो छ। पौंणा क नौं पको सब्बी चखो। पांच दिनुं मा मढी कि जुगेंणि माईयुं दगड किर्तन भजन संध्या मा बग्त कब उढै पता नि चले?
पिछला मंगलवारौ बसंतदेई को धर्मी हुजुम ब्याखुणियुं बरखा मा तिरपित ह्वेक पौंच्छे छौ। पौडी क्युंकालेश्वर ह्वेक भगवती उल्खागढी, कठुली मादेब, थापला चिमनयुं धार धार छुटेंन अर जाख खोब ह्वेकि उतरेंन यख दांदणी मादेब मु। उल्खागढी भगवती ऐंच कठुली धार पोर ढौंढ मा छ।ये खंडाह गडोला कि इष्टदेवी ह्वे उल्खागढी।खंडप या खंडाह नदी को उद्गम भगवती उल्खागढी को द्युल निस हि मणें जांद। जगा जगा धारों बटे पाणी ऐकि खंडप खंडाह नदी बंणद अर बिल्वकेश्वर बिल्केदार मु अलकनंदा दगड भेंट करिक वींमा समै जांद। यांको उल्लेख केदारखंड मा छ। गाड म्येटि गंगा ये को हि बोले जांद। गडोला क सेरौं मा रोपेंणी होंण चुलै पैली भगवती को रोट काटंण जरुरी होंद। भगवती रूष्ट ह्वेगे त समझा अति जलवृष्टि क कारण ह्वै तवै होंण तय छ।कठुली क जटेश्वर मादेबै जटों मा पाणी चढैक आत्म संतुष्ट होयुं धर्म जत्था यख पौंच्छण मा क्वी दिक्कत नि ऐई। भगतों तैं क्य परेशानी होने? कठुली को जागीरदार अपणा आदमियुं दगड दांदणी तलक अडेथणों ऐई।

बरखाऽ ठंडा पाणिंन हुजूम मा सब्बिया सब्बी भिजयां टठकरेंणा। दगडा कि जुगणियुंन गुरूमाई क दर्शन कन्नै इच्छा जतै छै। इच्छा त बसंतदेई कि भी छै गुरूमाई भेटेंणै। बालपना बटे गुरूमाई वींकि देखीं भलीं छै। हर साल जातरा पर बद्रीनाथ केदारनाथ जाव। हर साल मौ क मैना सी राजमोहल आंद छा। छौंदा दासियुं क बसंतदेई गुरू चेलियुं क जमात कि सेवा कन्न मा अगनै रांद छै। धर्म अर धर्मी लोखुं को सरंक्षण मा राजमोहल सदानि अगुवा रै। आखिर रज्जा तैंनौबत बजण दां विरूद्धावलि मा ‘ धर्म रक्षक, धर्म परायण’ कि उपाधि सुदि नि बोलेगे। दांदणी मादेबै माईयुंन खुशी खुशी धर्मी हुकुमै आगवानी करे छै।हर साल बसंतदेई यख दांदणी मादैब मु पाणीं चणोणौ आंद।आज बसंतदेई को वापस पैटणौ दिन छ। बाघसिंग वूं लेणौ सुबेरि पौंच्छे। पलिंगेर हाजिर छन।आज सौंणौ आगास साफ छ।
” स्यमन्या दिसा, नमोनारायण मैंजी”—बाघसिंगन धै धाद मारे अर एक ढुंगा मा बैठि गे।खडग बगल लटगणी। गाति उंद पसनिया छिमनांणी।पलिंगेर बी दगडा ऐकि बैठेंन।
“आज बसंता खुणी कल्यो ठोफरो धन्न पोडलो”—आसन पर बैठिं गुरुमाईंन बोले। दगडा कि जुगिणी सब्बी खिगताट करे हैंसण बैठेंन।
” मैत जाणों छौं मि माईजी,सैसूर ना”—बसंतदेई त्यार होंद मुल्के। भगोया हि पैरद वा अर नांगा खुट्टा चलद। दासी दगडा खडी रांद।
” यो तेरो सैसुर हि छ लाडी।कब बटे बोलणो छौं कि ये मादेबा शरण ऐजा। मि दिक्षा दिलै देलो”
” जरूर आलो माईजी, अबी इच्छी बग्त लगलो “
वू बग्त जब आलो?”
” देखा तब वेकि इच्छा “—बसंतदेईन शिवलिंग जनै देखिक बोले।
” अर तुमारा बुवाजी माराज क्य छन बोलणा?”
” बुवाजी माराज कख छन संयास लेंणै अनुमति देंणा?मि वूं मनांण पर छौं लगयुं “— बसंतदेई न निराश ह्वेक बोले।
” जल्दी औउ,फेर यो सैरो राजपाठ त्येरो छ”—गुरुमाईंन बोले अर हैंसण बैठे। बसंतदेई क मुख पर बी हैंसी छै गे अर उठिक वा गौ देखणों दासी दगड साळी चलिगे। दगडया दासी ‘बीरा’ वींका उमरै छ।सदानि परछाई बणीं दगडा चलद। बिन ब्वे बुवै नौनि बीरा बालपना बटेक राजमोहल मा दासियुंन पालिक बडी करीं छ। आंगडी घाघरी अर खुट्टियुं मा झेंवर पैरीं,मुंड मा सदानि सपको चुनरी धरद। बीरा अर कुंवरि बसंतदेई को जोडा ह्वे।
सिरीनगर जांण चूलै पैली बसंतदेई गौ दर्शन कन्न चाहणी छै। एक माई ऐकि गुरुमाई तैं सुलगयीं पतबीडी हाथ पर थमै गे।
” करली बसंता जोग संयास धारण?”—सिरीनगरी माई संता गिरिंन पूछे। संता माई बी पच्चपन बरस वय कि रै होली।
” वींका मन मा छैं छ। राजघरै लाडी नौनी फकीरी मा जीवन जींणी छ। मैं जांण मा वा बणीं हि मादेब कि सेवा क वास्ता छ”— गुरुमाईंन बोले अर तंबाखु पेंण लगे।
” किस्मतै मरीं छ। हेरां! बेदी रांड छ बसंता “—माई संता गिरिंन ठंडी श्वास भोरिक बोले।
” बेदी रांण नि बोल या”—गुरूमाईंन उलाहणो दिंनी।
” बेदी रांड हि ह्वे,जैंको ब्योला बरात घौर सैसुर बौडदि दां बाठा मा घोडा बटे भेळ लमडिक खतम ह्वे गे छौ। तेरा बरसै छै उबारी स्या खडेयीं”—संता माईंन बतै।
” बसंतदेई तैं देखिक लगदो नि। गाति परौ सिंदूरी रंग अर मुख परौ तेज वीं महात्मा जन रूप बतांद”
” बसंता तैं शरेलै चिंता नि रांद। जख सोनु छ तख नाक नि,जख नाक छ तख सोनु नि”
” सैसुर कख छौ?”—गुरूमाईंन पूछे।
” सैसुर वींको कपाल। हिमाचल रजवाडों मा छौ कखि।ब्योली को डोला अधबाठा बटे वापस कर दिये गे छौ।सैसुरौ कबी मुख देखे नि।तबारी बटे यखि सिरीनगर रांद। बल आप घर नितर बाप घर”— संता माईन गैरी लगै।
” हे राम!,टिपडो नि दिखै होलो ढंग करि?”
” कै को टिपडो? करडा ग्रह छन बल वींका।सतमंगल्या जुदी। भाग मा ब्यो भंता नि।बल जख नाक छ तख सोनु नि अर जख सोनु छ तख नाक नि।सब दै कि माया “
” ह्वे तब”— सुणिंक गुरुमाईंन तंबाखूवी सौड खींचे अर पतबीडी संता मु थमै।
औजियुंन ढोल दमौं बजैंन। माईयुं मा सगर बगर ह्वे। बसंतदेई कुंवरि गुरुमाई अर जुगिणी माईयुं भेंटेक सिरिनगरौ पैटी। मानो क्वी नौंनी ससुरास जांणी हो।
” त्यरा बगैर अब हमुं बुरु मणेंण, यन समझा मढ़ी सुन्नकार ह्वेगे”— गुरुमाईंन बोले।
” जल्दी औलो बौडिक”— बसंतदेईंन सांत्वना दींनी अर बुलंद आवाज मा जैकारो लगै—
” विश्वेश्वर मादेब की जै”
” जै जै”
अब अगनै पैदल बाठो नपेंण।पालंगी छ पर खाली चलणी छ। संता माई ,चेली, दासी दगडा छन।जगा जगा बाठों पाणी बगी आणो छ। पुंगणों नाज होयुं।सेरौं बटे धानै खुशबू उढी आंणी। अगनै घोडा मा बाघसिंग चलणो। चढै उतरिक घाटटी मा आयेगे। चमराडा मु पुराणो चमनेश्वर मादेब द्युल अर मठ छ।मठै माईंयूंन सिरीनगरी दलै आगवानी करे।
चमनेश्वर मादेब कि जै !!”
पूजा अर्चना क बाद दल अगनै पैटे।नयालगढ को जागीरदार गढपति सुरजू नयाल घोडा चढ़िक अपणा सिप्पैयुं दगड भेटेंणो ऐई। दूर धार बटे वेन वूं आंद देखेली छौ।सेवा सौंवी ह्वे।दस्तुर क तहत फल फूल भेंट करेंन। कुशल क्षेम जंणणा बाद सिरीनगरी दल अगनै बढ़े।नयाल जागीरदार सीयम तलक अडेथणो ऐई।
सैंणा बाठा फुंड नयालगढ क खेती करदारा,घस्सुए,जातरी ढाकरी भेटेंणा छन।सेवा लगांणा छन।पार सामणी धार मा नयालगढ छ।अगनै चलिक बाठा मा ढामकेश्वर मादेब पोडे।
” ढामकेश्वर मादेब कि जै!”
पुरातन बडो भारियु त्रिरथ द्युल।बिशौणी ह्वे।महन्तन अगनै ऐकि आगवानी करे। महंत दगड माई बी छन यख। महंतन मादेबा दर्शन करवैंन। बसंतदेईंन जल चढै। माई जुगिणी भेटेंन। महंतन सब्बूं बासा रूकणौ आग्रह करे ,पर कख, कैन मंण छौ?घडिएक विश्राम करिक सी सिरीनगरौ चलेंन। खंडाह घाटटी मा गाड़ बगणी छ।गाडा छाळा अगल बगल सेरा छन। सेरौं कि लंबी लंगत्यार।सेरौं धान रोपै होयीं छ। हरयां कलबळा धाना लूंगा बडा बडा होयां। धानै खुशबू उडणी।गाड सरपट बगणी।पार सामणी धार मा सिल्ला बिष्टों को ‘चढिगौं’ छ।युं बिष्टुं तैं मासौं सेरो रौत रूपी जागीर मा मिलयुं छ।यख ‘जीरी बासमती’ होंद।
” जाट रज्जा ओर कख ठैरी होला बाघसिंग?”—बसंतदेईन पूछे।
” वू लोग , वू त तंबू ताणीं ऐंच तप्पडों रांदन”—बाघसिंगन जवाब दिंनी।
” किल्लै?”— बसंतदेई मुल्की।
” बडा लोख छन,अलग वूंका आचार विचार। आज भोल मा पार दयुलि शामशाही मोहल मा राहणो चलि जाला। वूंकि व्यवस्था वखि होयीं छ”
” सैद मा चौमास यखि काटदन”
“गढदेश मा शरणागत छन सी।वूंका भांडा पतेलौं देखिक मिन पैली हि बोलेलि छौ तौंन बिजाम दिन यख राहंण”— बाघसिंगौ बोलण छौ कि बसंतदेई समेत सब्बी खिगताट करे हैंसण बैठेंन।
” रज्जा छन सी बाघसिंग”—बसंतदेईन हैंसी रोकिक बोले।
” वू त सही बात छ। रज्जौं क घौर मोतियुं को अकाल कख होंद? धन वूं मु अथाह दिखेंद।रोज एक लगोठिया खांदन बल सी। झणी क्य क्य मैंण मसाला डालदन तुडका मा? पूरा सिरीनगर मा वूंका मसालों कि गंध उढी आंद”—बाघसिंगन अपणी रौ मा बतै।
” मसाला?”—बसंतदेईन अचरज माणैं।
” जी दिसा, खुशबूदार मसाला। खुशबू यन कि सूंगी भुख खुल जौ। कख बटे ऐई होला वूं मु यन मसाला?आजब्याली वूंको सामान सटरम बक्शा जाखणी मु गंगाल तौरेक पार करवाऐंणो छ। गंगाजी दिखयो सम भरी बगणी छ।वू त भलो हो वे भादू धुनार को जैका कुटुम्ब रिश्तादार सब गंगाल तौरांण पर मिसयां छन। गंगाल वार पार पैगोडा रस्सा छन कसयां। जाट रज्जा वास्ता ये बसग्याल सांगौं पुल छ दुबारा लगणो।ढुंढा बसांणा निंन”
” सामान त बिजाम छ वूं मु”—बसंतदेईन बोले।
रज्जा छन सी,जाट रज्जा”— बाघसिंगन बोलिक अपणो घोडा रोके। गदरा गदरी चलिक सी किर्तन भजन गांद दोफरा मा अब खंडाह रत्नेश्वर मादेब मु पौंच्छ गेंन। उमस गरमन गाति परै लत्ती कपडी पसनियांन भिज गेन। बसंतदेईन बी थौक मैसुस करे। बसग्याली बाठो हिटण मा आसान नि छ। जगा जगा पाणीं छैं छ पर पेंणों पाणी हर जगा नि मिलद।
सामणी पार रत्नेश्वर मादेब को बडो त्रिरथ द्युल छ। द्युल उठयां भीटा मा छ। निस खंडप नदी वेग मा बगणी। गुरूगौं क सेरौं रोपणी होयीं छ।घसेरी पाखों घास कटणी छन। सामणी करैंखाल धार पोर सिरीनगर राजधानी छ, मादेबा दर्शन अर विश्राम करिक धार चढिक सिरीनगर राजधानी उतरला।
” दिनमानौ पडौ यखि रत्नेश्वर मादेब मु डालदां बसंता, घाम गरम भरि ह्वेगे,नहेंणी धुवेणी बी ह्वे जाले।”—संता माईंन सलाह दींनी।
” पूरा सातों क सात मादेबों मा जल चढैयेली हमुंन”—दासी बीरांन हुंगारो भोरे।
” क्युंकालेश्वर, जटेश्वर, विश्वेश्वर,चमनेश्वर, ढामकेश्वर, रत्नेश्वर…..अबी बिल्केदार मादेब मु जांण रयुं छ। या गाड उल्खागढी बटेक निकली बिल्केदार मादेब मु गंगाल मिलद। हमुंन बिल्केदार भोळ जांण”—बसंतदेईन जन बोल्यो याद दिलै हो
” यखि विश्राम कन्न उचित रालो दिसा”—बीरा दासिंन सलाह दींनी।
” ठीक छ माईजी, रत्नेश्वर मादेब मु विश्राम करदां।घौर हि त जांण। पाणी को धारो छ अर आम बी बिजाम छन”— बसंतदेईंन बोले त ‘आम’ सुंणिक सब्बी मुलकंण बैठेंन।
” रत्नेश्वर मादेब कि जै”
” गुरूमाई छा पुछणा कि त्येरा ज्वैं कै जन छौ?”—संता माईंन मजाक करे।
” म्यारा स्वामी?”—बसंतदेईन अचरज माणैं।
” हां “
” वेकि शक्ल शिवलिंगा ढुंगा जन छै”—बसंतदेईन जवाब दिंनी। सब्बूं मा लुकां मुखन खिगताट सरे।

या कथा गढ़वळि पत्रिका धाद का अगस्त – 2025 का अंक मा बि प्रकाशित हुई छ ।

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