तू होली उंचि डांड्यूं मा बीरा-घसियारी का भेषमा-खुद मा तेरी सड़क्यों पर मी रोणू छौं परदेस मा….’
ऑल इंडिया रेडियो से पहली बार जीत सिंह नेगी के गढ़वाली गीत का हुआ था प्रसारण
गढ़वाली लोकगायक जीत सिंह नेगी की जयन्ती पर विशेष
बिमल नेगी
उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी को गढ़वाली गीत – संगीत को एक पहचान दिलाने के लिये सदैव याद किया जायेगा। यह काम उन्होंने उस दौर में किया जब आज की तरह प्रचार माध्यम नहीं थे। वह पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक भी रहे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।
गीतकार, संगीतकार, गायक, नाटककार, कलाकार, रंगकर्मी, अभिनेता और निर्देशक की अलग अलग भूमिकाओं में पहचान रखने वाले गढ़वाल के प्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी का नाम लोकगायन के क्षेत्र में ही सर्वाधिक लोकप्रिय व सर्वविदित है। वे उत्तराखंड के ऐसे पहले लोकगायक थे, जिनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड यंग इंडिया ग्रामोफोन कम्पनी से 1949 में जारी हुआ। इसमें 6 गीत शामिल किए गए थे। उनका यह गाना ‘तू होली उंचि डांड्यूं मा बीरा-घसियारी का भेष मां-खुद मा तेरी सड़क्यों पर मी रोणू छौं परदेस मा….’ बहुत ही लोकप्रिय व प्रचारित हुआ।
जीत सिंह नेगी का जन्म 2 फरवरी, 1925 को पौड़ी जिले की पैहुलस्यूँ पट्टी के अयाल गांव में सुल्तान सिंह नेगी और रूपदेयी नेगी के घर हुआ था। जीत सिंह नेगी अपने दौर के न केवल जाने-माने लोकगायक रहे, बल्कि उत्कृष्ट संगीतकार, निर्देशक और रंगकर्मी भी रहे। दो हिंदी फिल्मों में भी उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। ‘रामी बौराणी…’ ‘मलेथा की गूल…’ ‘शाबासी मेरो मोती ढांगा…’ आदि कई उनके नाटक भी लोकप्रिय हुए। वे पहले ऐसे गढ़वाली लोकगायक थे, जिनके किसी गीत का ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण हुआ।
1950 के दशक की शुरूआत में रेडियो से यह गीत प्रसारित हुआ तो उत्तराखंड से लेकर देश के महानगरों तक प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच वह बेहद लोकप्रिय भी हो गये। इस खुदेड़ गीत के बोल थे, ‘तू होली उंचि डांड्यूं मा बीरा-घसियारी का भेष मां-खुद मा तेरी सड़क्यों पर मी रोणू छौं परदेस मा….’ (तू होगी बीरा उंचे पहाड़ों पर घसियारी के भेष में और मैं यहाँ परदेश की सड़कों पर तेरी याद में भटक रहा हूं-रो रहा हूं।).

जीत सिंह नेगी का निधन 21 जून, 2020 को हुआ। उन्होंने अपने धर्मपुर स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन से गढ़वाली लोकगायकी व गीत संगीत के एक युग का अन्त हो गया।
उनके लोकगीतों लोकप्रियता को भारतीय जनगणना सर्वेक्षण विभाग ने भी प्रमाणित किया। भारत सरकार के जनगणना विभाग के ग्राम सर्वेक्षण में सामूहिक सर्वप्रिय लोकगीतों में जीत सिंह नेगी का गीत भी शामिल था। जीत सिंह नेगी ने दो हिंदी फिल्मों में भी बतौर सहायक निर्देशक कार्य किया। वह संगीतकार और रंगकर्मी भी थे।
नये पीढ़ी के बहुत कम लोग ही उनके गीतों से परिचित थे इसलिये नई पीढ़ी को जीत सिंह नेगी की रचनाओं से परिचित कराने के उद्देश्य से नरेंद्र सिंह नेगी ने उनके गाए गीतों को अपने स्वर में लयबद्ध किया। नेगी जी ने ‘तू होली वीरा’ नाम से टी० सीरीज से एक कैसेट लाँच की जिसमें उन्होंने जीत सिंह नेगी के लोकप्रिय गीतों को स्वर दिया।
नरेंद्र सिंह नेगी ने एक साक्षात्कार में बताया था, “एक बार दुबई में मैं प्रोग्राम कर रहा था तो वहां कुछ बुजुर्ग लोग थे। उन्होंने मुझसे कहा कि जब भी भारत जाना होता है, आपके गाने तो हमें मिल जाते हैं और हम रिकॉर्डिंग ले आते हैं, लेकिन जीत सिंह नेगी की रिकॉर्डिंग नहीं मिलती है। मैंने उन लोगों को जवाब दिया कि वे ऐसी अवस्था में हैं कि रिकॉर्डिंग नहीं हो सकती है।”
नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा, “बाद में जब मैं देहरादून में पोस्टेड था, तब 1991-92 में मैंने जीत सिंह नेगी के सामने एक प्रस्ताव रखा था कि लोग आपके गानों को ढूंढते हैं, लेकिन आपके गाने मार्केट में नहीं हैं। मैंने उनसे इजाजत मांगी कि आपके गीत गीतों को मैं अपनी आवाज में गाना चाहता हूं, तो इस पर वे बहुत खुश हुए। उन गीतों को लिखने पर जीत सिंह नेगी के लिए कंपनी ने 25 हजार रुपए का चेक दिया था। जब इस चेक को उन्हें सौंपा गया तो उनकी आंखों में आंसू आ गए थे। वह रिकॉर्डिंग को लेकर बहुत खुश हुए थे।”
जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के पहले लोकगायक हैं, जिनके गीतों को उन्हीं के स्वर में 1947 में एचएमवी कंपनी ने रिकॉर्ड किया था। अपने लोकप्रिय गीतों के लिये जीत सिंह नेगी उत्तराखण्ड के लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे।



