दिनांक 29 अगस्त, 2025
गाड कैका समझौणमा नि ऐ। मान जा, मान जा, पर क्वी माना बि जब न्हां ! उबरि ज्वनि कु उमाल़ छौ। न देखि ऐथर न पैथर। हालांकि पहाड़ल काफी गंगजाट कै, आंसु ब्वगैं पर गाड कि जिकुड़िमा जरा भि कल़कलि़ नि लगि। पहाड़ थैं छट्ट छोड़ीई गाडल पिछनै नि देखि अर एकदम उंदु जाणी रै। वेन काफी घाद मरिन पर देबै मौ, कैन सुणनै छौ-पहाड़ बयांदु रैगे।
घर से भैर निकली़ई गाड तेजी से बगणी रै। देस-देसुकि सैर कर्दा-कर्दा, सर्या मुल्क घुम्दा-घुम्दा वो समुद्रमा पौंछि गे। वख हजारों गाड गदनि पैलिई बटे मौजूद छै। अपणा रूखा मुल्क का मुकाबला यख काफी सुन्दर महसूस हूण छौ-कुछ दिन इनि चौंप अर रौंसमा कटेगिन।
काफी दिन बाद गाड थैं अहसास ह्वेकि यख न त् मेरी क्वी अस्मिता ही छ अर न क्वी पछ्याण। तख गदनि त् भौत कट्ठा हुईं छन पर सब्यों का अपणा-अपणा रंग छन, ढंग छन। मन थैं व्यल़माणअ वास्ता समुद्रमा इनै बटे उनै भौत घूम ग्या पर ये रिंगण मा क्वी संतोष नि ह्वे। मन कबलाण बैठि गे। क्वी पुछदारू नी। जोश भी थकते गै छौ। घ्वीड़ थैं बल अपणु चांद प्यारो हूंद, उनि गाड थैं भी वख उकताट हूण बैठिग्या।
’अहा कनु मुल्क छ वो। छोयों को कनु रंग छौ-छालु चम्म। कनु संगीत फुट्दु छौ छंछड़ से फाल़ मर्दि बेर अर कनि रौंस लग्दि छै पहाड़मा घुनगलि़ या रड़ाघुसि ख्यल्दि दां।’ गाड खुदेण बैठि ग्या। पर करा त क्या ?
फिर गाड थैं एक जुगत समझ मा ऐ कि बादल बणी सीधा पौंछि जौं। पर जौं त कै मुखन। क्य कन्न ? मि वे थैं इतगा बिसिरि ग्यों कि पता नी वी मीथैं पछण्यदु छ कि ना। पर वो पैटि ग्या। फिर समुद्र से निकलीई रातौं-रात बादलु की यात्रा कैरिकि पौंछि ग्या अपणा मैत। पैलि घड़ेक चुपचाप द्यखणी रै। सर्यू पहाड़ वींका वियोगमा एकदम रूखू-सूखू हुयूं छौ। हालत एकदम खराब। वींकी मन नि थमे अर वो दणमण आंसु ब्यगोण बैठिग्या अर पहाड़ पर चिपिकि ग्या।
पहाड़ खुश ह्वे। वे कुछ राहत मीली। वो समझि गे कि मेरी भजेड़ खुदेड़ बौड़िकै ऐ गे। वेन सब आंसु अपणि जिकुड़िमा समैं दीन। अर कुछ दिनू बाद लोखुन द्याख कि पहाड़ फिर तन्दुरस्त ह्वेगे- चौछोड़ि हैरू भैरू।




