उत्तराखंड

शपथ खाकर भूल जाते तुम जनता की सेवा करना

रस्म अदायगी तक रह गये हैं माननीयों के शपथ ग्रहण समारोह

शपथ ग्रहण करती पौड़ी की जिला पंचायत अध्यक्ष

दिनांक : । सितम्बर, 2025

पौड़ी । संवैधानिक पदों पर शपथ खाने – खिलाने का दस्तूर अब महज औपचारिक होने लगा है। इसलिये देश व राज्य में संविधान के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों को छोड़कर अन्य व्यक्तियों को इस शपथ प्रक्रिया से मुक्त कर देना चाहिए । खासकर पंचायतों में देखा जा रहा है कि विधि के अनुरूप कर्तव्य का श्रद्धापूर्वक निर्वहन का महत्व लगभग खत्म हो गया है।

हमारे देश के संविधान में ही नहीं बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में संवैधानिक सर्वोच्च पदों पर विधिपूर्वक ईमानदारी से जनहित में कार्य करने के लिये शपथ या प्रतिज्ञा जिसे प्रतिज्ञान भी कहते हैं, की व्यवस्था है । अधिकांश देशो मे ऐसे पदों पर शपथ लेकर बैठे व्यक्ति इसके अनुरुप भी कार्य करते हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में संवैधानिक पदों पर बैठे सभी व्यक्तियों को शपथ / प्रतिज्ञा दिलाना बिल्कुल फिजूल की बात है। सभी संवैधानिक व्यक्ति अपने कार्यकाल में शपथ को एक किनारे रख कार्य करते हों ऐसा भी नहीं लेकिन व्यवहार में दिखायी देता है कि अधिकतर ऐसे शपथ लेने वाले व्यक्ति शपथग्रहण के दिन ही शपथ लेने के बाद यह भूल जा रहे हैं कि उन्होंने इस पद पर ईमानदारी यानि सत्यनिष्ठा से कार्य करने की शपथ ली है। 

संवैधानिक पदों पर शपथ संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों के तहत ली जाती है, जैसे राष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद 60, राज्यपाल के लिए अनुच्छेद 159, और मंत्रियों के लिए अनुच्छेद 164(3)। इसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 188 (राज्यों के लिए) और अनुच्छेद 99 (संसद के सदस्यों के लिए) के तहत शपथ ली जाती है, जबकि पंचायत सदस्यों को शपथ उनके राज्य के पंचायत राज अधिनियम की संबंधित धारा के अनुसार दिलाई जाती है, उत्तराखण्ड में उत्तराखंड पंचायत राज अधिनियम, 2016 के अनुसार, ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के सदस्यों को अपना पद ग्रहण करने से पहले, भारत के संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी या प्रतिज्ञा करनी होती है। यह शपथ भारत के संविधान के प्रति निष्ठा बनाए रखने और अपने पद के कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करने के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाती है। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 243 (2) और (4) के तहत निर्धारित है, जो त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली के सदस्यों के निर्वाचन और उनके पद के निर्धारण से संबंधित है। 

संवैधानिक पदाधिकारियों को दिलाई जाने वाली शपथ में यह सुनिश्चित करने के लिये ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है कि पदाधिकारी देश की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखेंगे। इस प्रकार, शपथ उन सिद्धांतों को दर्शाती है जिन्हें पदाधिकारियों को बनाए रखना चाहिये। शपथ यह भी सुनिश्चित करती है कि पद पर रहते हुए व्यक्ति विधि के अनुरूप कार्य करेंगे । उन्हें संविधान के तहत एक बड़ा दायित्व दिया गया है और हमारे संविधान निर्माताओं की अपेक्षा थी कि ऐसे पदों पर बैठे व्यक्ति कर्तव्य निष्ठा व ईमानदारी के साथ कार्य करेंगे तथा किये गये कार्यो के प्रति जबाबदेह भी रहेंगे ।

सोचा बहुत कुछ था। अपेक्षाएं बहुत कुछ थी लेकिन आज यह देख गया है कि ऐसे पदों को साम – दाम -दण्ड -भेद से हथियाने के बाद हमारे अधिकांश प्रतिनिधि शपथ तो ले रहे हैं लेकिन इन पदों के जरिये अपनी स्वार्थ सिद्धी में इस तरह लग जाते हैं कि पांच साल तक उन्हें यह याद नहीं आता कि उन्होंने इस पद पर कार्यों के निष्पादन हेतु कुछ शपथ भी ली थी। इसलिये जनता अब पंचायतों के शपथ ग्रहण समारोहों को हिकारत की नजर से देखते लगी है। जबकि दूसरी ओर इन शपथ ग्रहण समारोहों को दिव्य और भव्य बनाते में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। 

आज संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकाश व्यक्तियों द्वारा जिस तरह आचरण व व्यवहार किया जा रहा है वह उनके उस शपथ या प्रतिज्ञान के अनुरूप नहीं जिसे उन्होंने ईश्वर को साक्षी मान कर या सत्यनिष्ठा से लिया । आज लगभग इन पदों की गरिमा को तार – तार होते हम रोज ही देख रहे हैं। ऐसे पदों को कई प्रतिनिधियों ने भ्रष्ट आचरण, भ्रष्टाचार और धन शोधन का जरिया बना दिया है। इसलिये समाज में भले ही इन पदो के प्रति आकर्षण बढ़ा हो लेकिन इन पदो पर बैठे अधिकांश व्यक्तियों के प्रति आम जनता का विश्वास लगभग खत्म हो चुका है।

जनप्रतिनिधियों के प्रति आम जनता के घटते विश्वास को देखते हुए ही यह का जा रहा है कि अब इस तरह के शपथ ग्रहण या यूं कहें कि राज्याभिषेक कार्यक्रम जिसमें पूरे जनपद में लाखो रुपये खर्च हो रहे हों और जो महज औपचारिक खानापूर्ति से अधिक न रह गये हों उन पर सरकार को पुनर्विचार करता चाहिए । 

अब देखा यह जा रहा है कि कई बार ऐसे संविधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति उनके कार्य काल मे हो रहे भ्रष्टाचार को दबाने में पूरा जोर लगा दे रहे हैं। ऐसे व्यक्तियों को प्रायः राज सत्ता का संरक्षण प्राप्त रहता है जिससे वे इसमें कामयाब हो जाते हैं और उन पर आंच भी नहीं आती । सब को पता रहता है कि यहाँ क्या हो रहा है लेकिन होता क्या है? ऐसे ही लोग पुनः सत्ता में आकर शपथ लेकर कुर्सियों में विराजमान हो जाते हैं। इसलिये अब लोग कह रहे हैं कि बहुत हो गया। अब इस तरह के समारोह बन्द ही हो जाने चाहिए । या फिर जैसे अदालतों में होता है झूठी शपथ खाने पर कार्रवाई की तलवार लटकती रहती है उसी तरह की कोई व्यवस्था ऐसी शपथों के लिये भी होती चाहिए ।

=बिमल नेगी

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