साहित्य व संस्कृति

सांस्कृति धरोहर को बटोरने, सहेजने और आगे बढ़ाने में लगा है लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र

अब तक अनेक उपलब्धियाँ हैं लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र के खाते में

दिनांक : 4 सितम्बर, 2025

पौड़ी। रोनिका राणा का चयन अभी पिछले दिनों नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा दिल्ली ( एनo एस० डी०) में हुआ है। वह बहुत खुश है। देश के इस सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज में तीन बर्षीय डिप्लोमा पाठ्यक्रम के लिये प्रतिवर्ष 30 छात्र – छात्राओं का चयन होता है। रंगमंच की दुनिया में जाने वाले छात्रों का सबसे पसंदीदा ख्वाव एन०एस० डी० में चयनित होना है। रोनिका ने हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के लोककला और संस्कृति निष्पादन केन्द्र में थियेटर की बारीकियों व गहराईयों को सीखते हुए यह कर दिखाया । रोनिका सद्रप्रयाग जनपद के रतूड़ा की रहने वाली हैं। रोनिका के साथ ही इससे पूर्व इस केंद्र के पांच अन्य छात्रों का चयन भी एन० एस० डी० में हुआ है। इस केंद्र से निकले अनेक छात्र – छात्राएं मसलन यतीन्द्र बहुगुणा, बबीता ठाकुर, अंजलि नेगी (फिल्म – बोल दियां वूं मा )और महेंद्र पंवार आदि बॉलीवुड में भी अपनी बेहतरीन पहचान बना चुके हैं।

यह एक बड़ी उपलब्धि है। रोनिका के लिये ही नहीं विश्वविद्यालय के लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र के लिये भी । पूरे पहाड़ के लिये भी । लेकिन इस केन्द्र के लिये रोनिका गिनती में भले ही यह एक उपलब्धि है लेकिन ऐसी अनेक उपलब्धियाँ इस केंद्र के खाते में दर्ज हैं। यह केन्द्र पिछले एक हफ्ते से यकायक चर्चाओं में आया है। चर्चाओं के केंद्र में पत्रकारिता और संस्कृति के मर्मज्ञ व चर्चित व्यक्तित्व गणेश खुगशाल ‘गणी’ हैं जिनका इस केंद्र के निदेशक पद पर  नियुक्ति हुई है। संजय पांडे और महेन्द्र पंवार तो पहले से ही यहां कार्यरत थे। हलाँकि उन्हें अब क्रमशः उपनिदेशक और सहायक निदेशक के तौर पर स्थाई  नियुक्ति मिली है। इससे पूर्व इस केंद्र में डॉ० अजीत पंवार भी थियेटर के क्षेत्र में 14 वर्षों तक अपनी उल्लेखनीय सेवाएं दे चुके हैं और आज वे दून विश्व विद्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

उत्तराखंड सरकार द्वारा 2006 में गढ़वाल विश्वविद्यालय को लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केंद्र की मंजूरी दी गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की लोककला एवं संस्कृति को संरक्षित एवं पुनर्स्थापित करना था। उत्तराखंड में अपनी तरह का यह पहला केंद्र है जो हिमालयी संस्कृति और विरासत का संरक्षण, लोक कला व रंगमंचीय अभिव्यक्ति में प्रयोग, पारंपरिक नृत्य व गायन शैलियों का संरक्षण, उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का प्रचार प्रसार, क्षेत्रीय कला, भाषा और संस्कृति में शोध तथा कला और सांस्कृतिक क्षेत्र में रोजगार का सृजन करते की दिशा में काम कर रहा है।

गणेश खुगशाल ‘गणी’ पौड़ी में सम्मानित होते हुए ।

वर्ष 2006 में केंद्र की राज्य सरकार से मंजूरी के बाद 2007 से केन्द्र ने कार्य शुरू कर दिया था। उस समय यहाँ प्रदेश सरकार से अध्यापन हेतु तीन पदों की मंजूरी मिली थी। जिसमें एक प्रोफेसर, एक एसोसिएट प्रोफेसर और एक असिसटेंट प्रोफेसर शामिल थे। वर्ष 2009 में गढ़वाल विश्वविद्यालय केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत केन्द्रीय विश्वविद्यालय घोषित हुआ । कुलपति एस० के० सिंह के समय उक्त तीनों पदों को नॉन टीचिंग के पदों में कन्वर्ट कर दिया गया और इस तरह इस केंद्र में उक्त पद अब निदेशक, उपनिदेशक और सहायक निदेशक के रूप में परिवर्तित हो गये । लेकिन मजेदार बात यह है कि नॉन टीचिंग के पद होते हुए भी आज टीचिंग की जिम्मेदारी इन्ही की है। और बहुत संभव है कि भविष्य में ये पद प्रारम्भिक मूल टीचिंग के पदों में कन्वर्ट हो जांय । इनके अतिरिक्त केन्द्र में अन्य सहयोगी स्टाफ है।

टीचिंग स्टाफ की कमी के बाबजूद वर्तमान में इस केंद्र में एम०ए थियेटर की कक्षाओं के साथ है संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित यथा जागर, पांडवानी, बगड़वाली आदि में 13 एक वर्षीय डिप्लोमा कोर्सेज चल रहे हैं। 

लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र के संस्थापक निदेशक रहे प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी प्रोफेसर (डॉ0) डी० आर० पुरोहित का कहना है कि विगत 18 सालों में इस केन्द्र ने अनेक उपलब्धियाँ अपने नाम की हैं। उन्होंने कहा कि अपनी संस्कृति को संरक्षित करने, इसका अभिलेखीकरण करते, इसको डिजिटल फॉर्म में सहेजने, इसे लोकप्रिय बनाने और इसका प्रचार – प्रसार करने में इस केन्द्र का बड़ा योगदान है। उन्होंने बताया कि केन्द्र के माध्यम से अभी तक सैकड़ों नाटकों का अभिमंचन हो चुका है। पिछले तीन सालों में केंद्र ने स्वयं ही तकरीवन 70 नाटक तैयार किये और अभिमंचित किये हैं। चैती गायन, चक्रव्यूह, बूढ़देवा का मंचन अभिलेखीकरण के साथ ही नन्दादेवी राजजात को भी डाक्यूमेंटेड किया गया है। डिम्बर गाँव की रामलीला के साथ ही कई गायक कलाकारों के गीत – वार्ताओं को भी अभिलिखित किया गया है। उन्होंने बताया कि ढोल दमाऊँ पर बेहतरीन परफार्मेन्स व केन्द्र द्वारा उनकी  कला पर की गयी रिसर्च के आधार पर सोहनलाल को डी० लिट की उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है और वह विदेश में बिजिटिंग प्रोफेसर के रूप मे अपनी कला का प्रदर्शन कर चुका है। इस केंद्र द्वारा अभी तक 25 दिन का मांगल उत्सव व 12 दिन का कुमाँऊ फोक सौंग महोत्सव का भी आयोजन किया गया है। जिसमें इनका डॉक्युमेन्टेशन किया गया है। विभाग में गरीब लोक कलाकारों के लिये लोक कलाकार हॉस्टल बनाया गया है। उन्होंने बताया कि लोक धरोहर रम्माण में गायन लगभग बन्द हो गया था, इसे पुनः शुरू कराने का श्रेय भी लोक कला और संस्कृति निष्पादन केन्द्र को जाता है। केन्द्र के शिक्षक छात्रों ने रम्माण में पुनः गायकी शुरु की है ।

डॉ० पुरोहित ने बताया कि अनेक काम हुए हैं लेकिन अभी हमारी सांस्कृतिक विपुलता और विभिन्नता को देखते हुए अनेक काम होने बाकी हैं। उन्होंने बताया कि गीत और नृत्य से लेकर पहाड़ के मेले, त्यौहार, शिल्प यहां तक कि खेती बाड़ी यानि कृषि क्षेत्र की परम्पराओं के संरक्षण का कार्य अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। अपनी लोक भाषाओं पर काम करते की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि लोक भाषाओं पर कार्य करते हेतु एक पांच करोड़ का प्रोजेक्ट तैयार किया गया था लेकिन दुर्भाग्य से वह कतिपय कारणों से आगे नहीं बढ़ पाया। उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि अब गणेश खुगशाल गणी, संजय पांडे और महेन्द्र पंवार के केन्द्र में ज्वाइनिंग से केन्द्र की विभिन्न गतिविधियो में तेजी आयेगी और इसकी क्रियाशीलता बढ़ेगी । इन तीनों से कला व संस्कृति क्षेत्र के लोगों को बड़ी उम्मीदें हैं।

इधर, संस्कृतिकर्मी गणेश खुगशाल गणी के इस केन्द्र के निदेशक पद पर ज्वानिंग से पौड़ी में खुशी का माहौल है। नगरवासियों द्वारा उनके सम्मान में एक भव्य सम्मान समारोह का आयोजन किया गया । इसमें गणेश खुगशाल ने कहा कि उन्हें पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्द्धन और प्रचार प्रसार के साथ ही अपने बच्चों को सांस्कृतिक अध्यापन की जो जिम्मेदारी उन्हें मिली है, उस पर वह अपने पहाड़ की जनभावनाओं के अनुरूप खरा उतरने का भरसक प्रयास करेंगे । उनके लिये यह अपनी सांस्कृतिक संरक्षण, अभिवृद्धन और संवर्द्धन का मिशन है।

= बिमल नेगी

 

 

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