लोक भाषा

खतरे में पड़ी बौंगाणी (बंगाणी) भाषा को बचाने का संकल्प

बौंगाण औनि बौंगाणी" समूह द्वारा किया गया बौंगाणी भाषा (बोली) बचाने हेत खुमळि का आयोजन

उत्तरकाशी। 1 मार्च, 2026

बौंगाणी (बंगाणी) भाषा (बोली) को बचाने हेतु बौंगाणियों द्वारा निरन्तर प्रयास जारी रखने का संकल्प लिया गया है। यह संकल्प बौंगणियों द्वारा अपनी भाषा (बोली) को बचाने हेतु देहरादून में आयोजित एक खुमळि (बैठक) में लिया गया।

बौंगाणी (बंगाणी) उत्तराखण्ड की उन दस बोलियों में है जो यूनेस्को द्वारा खतरे में बतायी गयी है। यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एण्ड कल्चरल आर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने वर्ष -2009 में जारी एटलस ऑफ द वर्डस लैंग्वेजेज इन डेंजर में स्पष्ट किया था कि उत्तराखण्ड की 10 बोलियाँ खतरे में हैं। एटलस के मुताबिक उत्तरकाशी की बंगाण क्षेत्र में बोली जाने वाली बौंगाणी (बंगाणी) बोली भी खतरे में बतायी गयी थी। इसमें गढ़वाली कुमांऊनी भाषा को भी असुरक्षित वर्ग में रखा गया था। बौंगाणी (बंगाणी) भाषा गढ़वाली, जौनसारी और सिरमौरी भाषाओं से मिलती-जुलती है। एटलस में जिक्र है कि इस बौंगाणी बोली को बोलने वाले 12 हजार से भी कम लोग हैं।             

देहरादून में इस बैठक का आयोजन बौंगाणी (बंगाणी) भाषा के संवर्धन और संरक्षण के उद्देश्य से “बौंगाण औनि बौंगाणी” समूह द्वारा किया गया। यह आयोजन प्रख्यात समाज सुधारक सुरेंद्र सिंह रावत ‘सुराह’ की जयंती के सौ वर्ष के पावन अवसर पर संपन्न हुआ।

सुराह जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने बौंगाणी बोली के लिखे हुए रूप को पहचान दिलाई । यह काम उन्होंने आज से 55 वर्ष पूर्व कर दिया था । 

कार्यक्रम में वक्ताओं ने “सुराह” जी के विराट व्यक्तित्व और उनके समाज सुधार कार्यों पर प्रकाश डाला। सुराह जी ने आजीवन मद्यनिषेध (नशा-मुक्ति) और मंदिरों में प्रचलित निर्दोष जीवों की बलि जैसी कुरीतियों के विरुद्ध साहसपूर्वक आवाज बार-बार उठाई थी। अनेक विरोधों और कठिनाइयों के बावजूद वे सत्य, संवेदना और जागरूकता के मार्ग पर अडिग रहे। उनकी दूरदर्शिता और प्रखर चिंतन के कारण ही उन्हें स्नेहपूर्वक ‘सुराह’ नाम दिया गया।

सुराह जी ने अपने ईष्ट देव महासू देवता की आरती बौंगाणी भाषा में लिखकर भाषा और भक्ति को एक सूत्र में पिरोया। उनके प्रयासों से मंदिरों में बलि प्रथा पर काफी हद तक रोक लगी और समाज में नई चेतना का संचार हुआ।                   

खुमळि की एक विशेष बात यह रही कि इसमें शामिल सभी लोगों ने बौंगाणी भाषा के पहले रेडियो कार्यक्रम को एक साथ सुना । “हैलो हल्द्वानी” रेडियो द्वारा सीधा प्रसारित हुए इस कार्यक्रम में बौंगाणी रचनाकारों ने अपनी लिखी कविताएँ सुनायीं थी। रचनाकारों में मुख्य नाम मदन सिंह चौहान (कौळीच), प्रेम दत्त नौटियाल, हीरा लाल, देवेन्द्र दत्त नौटियाल (डौगुलि), बलबीर सिंह रावत, नेहा बौंगाणी (मौइंज़ौणी), डॉ.भजन सिंह चौहान (चिउँकै) और ललिता रावत (कोटी-बौनाळ).

“बौंगाण औनि बौंगाणी” समूह के फेसबुक पेज पर इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण भी किया गया ताकि इच्छुक बौंगाणी लोग लाइव के साथ साथ बाद में भी शामिल हो सकें।

इस अवसर पर आर. पी. विशाल, कार्यक्रम में “बौंगाण औनि बौंगाणी” समूह की उस टीम के सदस्यों की सराहना की गई, जिनके अथक प्रयासों से बौंगाणी भाषा की पहली प्रकाशित पत्रिका “इज़ाज़” का प्रकाशन संभव हुआ। “इज़ाज़” पत्रिका का पिछले तीन साल से प्रकाशन करने वाली इस टीम में शामिल हैं – आर पी विशाल (संपादक), मोहन सिंह चौहान, सुनीता मोहन मलेथा, जगमोहन बंगाणी, सुरक्षा रावत, मंजू राधा और शुबा ।                                                         

कार्यक्रम में सुरेश रावत, जगमोहन सिंह चौहान, डॉ. पवन रावत, महेश रावत, विनोद फांटा, डॉ. दीपा चौहान, सुधा रावत, सोमाली बिष्ट, सम्यक रावत सहित बौंगाणी भाषा की मुहिम में शामिल अनेक बौंगाणी व्यक्ति भी उपस्थित रहे। सुरेश रावत जी ने सुराह जी के सामाजिक योगदान के विभिन्न पहलू साझा किए।

बौंगाणी लोगों द्वारा व्यक्तिगत स्तर या आपस में मिल – जुलकर बौंगाणी (बंगाणी) भाषा (बोली) को बचाने का प्रयास से पहले से किया जा रहा है लेकिन बैठक कर सामूहिक प्रयास करने की पहल पहली बार की गयी है। उपस्थित बौंगाणियों द्वारा बौंगाणी भाषा के संरक्षण हेतु निरंतर प्रयासरत रहने का संकल्प दोहराये जाने के साथ इस खुमळि का समापन हुआ ।

= सुरक्षा रावत

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