‘बाबा’ पर बबाल से आखिर हासिल क्या हुआ?
बाबा के फसाद से फिलहाल बाल - बाल बच गया अपना कोटद्वार
पौड़ी। 3 फरवरी, 2026
कोटद्वार में बाबा शब्द पर हुआ बबाल दो धर्म सम्प्रदाय के फसाद में तब्दील होने से बाल – बाल बच गया। इस बबाल को रोकने में ढाल की तरह काम करने वाले दीपक के खिलाफ भले ही मुकदमा दर्ज किया गया हो लेकिन इतना तय है कि इसे पूरे प्रकरण का पटाक्षेप करने में दीपक की अहम भूमिका रही है।
इधर, बजरंग दल के ‘बाबा’ शब्द पर एकाधिकार जमाने को लेकर भी सोशल मीडिया में एक नयी बहस छिड़ गयी है। भाषाविदों का उल्लेख करते हुए तमाम लोग इस ‘बाबा’ शब्द की व्यत्पति को लेकर लम्बी चौड़ी बहसें कर रहे हैं।
कोटद्वार में कुछ दिन पहले एक मुस्लिम कपड़ा विक्रेता वकील अहमद की दुकान के नाम में ‘बाबा’ शब्द आने पर कुछ स्थानीय लोगों ने दुकान में घुसकर ऐतराज जताया। उनका कहना था कि ‘बाबा’ शब्द एक धर्म विशेष का है इसलिये मुसलमान दुकानदार को अपनी दुकान पर इस शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कोटद्वार के पटेल मार्ग स्थित इस मुस्लिम दुकानदार से बहस चल रही थी कि दुकानदार के पक्ष में नजदीकी एक जिम संचालक दीपक बीच – बचाव हेतू कूद पड़ा। दीपक का कहना था कि यह मुस्लिम बुजुर्ग यहाँ पिछले 30 साल से दुकान चला रहे हैं। अब तक किसी ने भी इस शब्द पर विरोध नहीं किया तो अब ऐसा विरोध क्यों?
‘बाबा’ शब्द का विरोध करने वाले लोगों ने जब उससे पूछा कि वह कौन है तो उसने अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया। उस समय जैसे – तैसे यह विवाद शांत कराया गया। लेकिन इस घटना की प्रतिक्रिया पर दूसरे ही दिन हिन्दूवादी संगठन खासकर बजरंग दल के कार्यकर्ता देहरादून, हरिद्वार आदि स्थानों से कोटद्वार पहुँच गये। उन्होंने कोटद्वार मालवीय उद्यान और पटेल मार्ग पर काफी हुड़दंग काटा। पुलिस को स्थिति नियन्त्रण में रखने में भारी जद्दोजहद करती पड़ी। पुलिस ने बमुश्किल मामले को शान्त कराया और बजरंग दल के बाहर से आये कार्यकर्ताओं को वापस भेजा।
अब इस प्रकरण में तीन एफआईआर कोटद्वार थाने में दर्ज हैं। पहली 30-40 अज्ञात प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सार्वजनिक शांति भंग करने, सरकारी कार्य में बाधा डालने और पुलिस से धक्का-मुक्की के आरोप में। दूसरी, स्थानीय निवासी वकील अहमद की शिकायत पर गाली-गलौज और जाति-सूचक शब्दों के प्रयोग को लेकर और तीसरी, कमल पाल की शिकायत पर दीपक कुमार और उनके साथियों के खिलाफ मारपीट और धमकी देने के आरोप में।
पुलिस का कहना है कि सभी मामलों की जांच निष्पक्ष तरीके से की जा रही है। अब यह भी कहा जा रहा है कि बाबा शब्द पर दोनों पक्षों की सहमति बन गयी है और अब ‘बाबा’ शब्द को नहीं हटाया जायेगा।
प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से देखें तो यह मामला काफी संवेदनशील है। लेकिन जनप्रतिनिधियों की इस मामले में चुप्पी भी उतनी ही खटकने वाली है। वह तो समय रहते दीपक के दुकानदार के पक्ष में खड़े होने और पुलिस की मुस्तैदी से बबाल को शांत कर दिया गया अन्यथा इस मामले के हिन्दू बनाम मुसलमान बनते देर नहीं लगती। तो क्या इस प्रकरण को खड़ा करने के पीछे कुछ लोगों की मंसा इसी तरह के किसी फसाद को खड़ा करने की थी? यह बात तो जांच के बाद ही सामने आयेगी।
कोटद्वार में जो कुछ हुआ वह गैर जरूरी और प्रदेश या समाज में अमन चैन के लिये अस्वीकार्य कहा जाना चाहिए। बाबाओं के भेष में घूम रहे छद्म भगवाधारियों का विरोध तो ठीक है। प्रदेश सरकार इनके खिलाफ ऑपरेशन कॉलनेमि भी चला रही है लेकिन बाबा नाम का उपयोग ये करेंगे या ये नहीं करेंगे यह निहायत ही समाज को पीछे धकेलने वाली मानसिकता है। वह भी तब जब विरोध करने वाले लोगों को यह पता नहीं कि असल में बाबा शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई है।
शब्द कोई भी हो जब वह समाज की जुबान पर चढ़ जाता है तो सार्वजनिक हो जाता है। यह कोई व्यक्तिगत सम्पति तो नहीं कि यह तेरी या मेरी है, इसलिये किसी सामान्य शब्द को धार्मिक विवाद में घसीटना और उससे साम्प्रदायिक माहौल खराब करने की आशंका को बल देना सभ्य समाज को स्वीकार नहीं हो सकता।
अब ‘बाबा’ शब्द पर सोशल मीडिया में चल रही बहस पर बात करें तो कहा जा रहा है कि बाबा मूल रूप से फ़ारसी का शब्द है उर्दू तुर्की आदि में इस्तेमाल होता है।
सोशल मीडिया में चल रही बहस में अनेक लोगों का यह कहना है कि अगर सवाल है कि बाबा शब्द हिन्दी का है कि संस्कृत का है या फिर आंचलिक है? तो डॉ० डॉक्टर सुरेश पंत का जवाब है कि ये शब्द बहुभाषी है।
प्रसिद्ध भाषाविद डॉक्टर सुरेश पंत के मुताबिक, बाप शब्द संस्कृत की वप् धातु से बना है. दरअसल हिंदी/संस्कृत व्याकरण में क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं. धातु वो शब्द है जिससे क्रिया के अन्य शब्द बनते हैं, जैसे ‘पढ़’ से पढ़ना, पढ़ा, पढ़ेगा आदि शब्द बने हैं. वैसे ही वप् शब्द का अर्थ होता है बीज बोना, पौधा लगाना, रोपना आदि. ये सब काम सुरक्षा और देखरेख से जुड़े हैं.
अब यहां से समझिए कि शब्द कैसे बनते हैं. जन्मदाता के तौर पर बीज बोने वाले का भाव बहुत महत्वपूर्ण है. वप्र, वापक या वप्ता का ‘व’ जब ‘ब’ बना तो वो वप्ता से बप्ता बना, फिर बप्पा बना और अंत में बाप हुआ. बाप से बना बापू और बाबू. अलग-अलग बोलियो में इसके बप्पा, बापू, बाप, अप्पा, अब्बा, बाबा, बाबू, बाऊ, बाबुल, बब्बा आदि शब्द भी खूब प्रसिद्ध हुए हैं. ये शब्द उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सभी भाषाओं में पाए जाते हैं. तो बाबा शब्द संस्कृत से हिन्दी में कैसे आया, इसकी यात्रा कुछ इस तरह से समझी जा सकती है ।
लेकिन डॉ० पन्त यह भी कहते हैं कि अरबी, फ़ारसी, तुर्की और पश्चिम एशिया की अनेक भाषाओं में भी यह शब्द है. जिसका अर्थ है पिता, बाप, दादा, नाना, सरदार. वहीं हिंदवी शब्दकोश के अनुसार पिता, पितामह, दादा, नाना, सरदार, बूढ़ा, बुज़ुर्ग, फ़कीर और बच्चे के सन्दर्भ में भी इस शब्द का इस्तेमाल होता था. ब्रिटिश राज के दौरान हिंदुस्तानी सेवक अपने ‘साहब’ के बच्चों को बाबा कहा करते थे.”
कहने का अर्थ यह है कि शब्द किसी भी भाषा का है जब वह सबकी जुबान पर चढ़ा है तो सभी का हुआ। आखिर हम भी तो पीर बाबा बोलते हैं। तो पीर के साथ बाबा का क्या सम्बन्ध है। इसलिये किसी शब्द के पीछे बेवजह के उन्मादी बबाल खड़ा कर समाज की शान्ति भंग करना करना किसी का भी मकसद नहीं होना चाहिए।
= बिमल नेगी



