राजनीति

धीमी आंच में ही सही खिचड़ी तो पक रही है

तो अपनी ही सरकार के कामकाज से सन्तुष्ट नहीं कतिपय नेता...

पौड़ी । धीमी आंच में ही सही लेकिन लगता है भारतीय जनता पार्टी के भीतर खिचड़ी जरूर पक रही है। पार्टी नेता लाख कहें कि पार्टी एकजुट है और कहीं मतभेद और मनमैल नहीं परन्तु कतिपय बड़े नेताओं के कार्य – व्यवहार और बयानों से एकजुटता में दरार तो नजर आती है। अब फटे टाट पर टल्ला तो लगाना ही पड़ता है नहीं तो झांकने वाले तो भितर तक झांकना नहीं छोड़ते ।

राजनीतिक दलों में पार्टी के अन्दर प्रायः विषयगत  घपरोळ होना बड़ी बात नहीं, ऐसा चलता रहता है और विभिन्न मुद्दों पर आपसी बहसें जिसे हम घपरोळ कह रहे हैं प्रायः पार्टी के आंतरिक लोकतन्त्र को मजबूत करती हैं। लेकिन यदि लक्षित घपरोळ हो तो चर्चाएं आम हो जाती हैं। विषयगत घपरोळ पर तो पैबन्द लगाया जा सकता है लेकिन लक्षित घपरोळ रायता फैलता है और आजकल ऐसा ही रायता पार्टी के अन्दर – बाहर देखने में आ रहा है।

भाजपा के अन्दर आपसी धड़ेवाजी की बातें दिल्ली में पारटी के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद महेन्द्र भट्ट के दिल्ली आवास पर हुई बैठक से शुरू हुई। इस बैठक में पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री व सांसद त्रिवेन्द्र रावत बैठक में शामिल होने पहुंचे जरूर लेकिन बैठक कक्ष में जाते ही उनके बाहर निकलने की बात मीडिया से लेकर आम आदमी तक किसी के गले नहीं उतरी । आखिर ऐसा क्या हो गया कि उन्हें इस तरह उनके कूचे से रुखसत होना पड़ा । इस बैठक में पारटी की टॉप लीडरशिप और पदाधिकारी थे तो ऐसा क्या हुआ कि उन्हें बैरंग वापस लौटना पड़ा । बैठक में सांसद अनिल बलूनी भी आमन्त्रित थे परन्तु उनके भी शामिल न होने से अटकलों का दौर शुरू हुआ । यहां तक तो ठीक था । पार्टी प्रवक्ता मनवीर चौहान ने इन दोनों के जरूरी कामों का हवाला देकर अटकलों पर टल्ला लगाने का काम कर दिया था । लेकिन इसी बीच जब उक्त दोनों सांसद पार्टी के उत्तराखंड प्रभारी दुष्यन्त गौतम के साथ एक साथ दिखायी दिये तो फिर लोगों के बीच चर्चाओं का बाजार गर्माने लगा । आखिर पारटी के प्रदेश प्रभारी श्री गौतम प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट की बैठक में भी उपस्थित थे तो उन्हें वहाँ मिला जा सकता था । यहाँ से पारटी की अन्दरूनी सियासत गर्माने लगी और बात आपसी धड़ेबाजी की चर्चाओं तक पहुँच गयी। चर्चाएं अब और गर्म इसलिये हो रही हैं कि सांसद त्रिवेन्द्र रावत धड़ाधड़ पार्टी के कतिपय सीनियर लीडर्स  से मुलाकाते कर रहें हैं। अब पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और विजय बहुगुणा से हालिया मुलाकातों को भी इसी सन्दर्भ में देखा जा रहा है। हलाँकि उनके बीच किन मुद्दों पर बाते हुई यह सामने नहीं आयी लेकिन कयास तो यहीं हैं कि त्रिवेन्द्र प्रदेश सरकार के कामकाज से नाखुशी का इजहार अन्य नेताओं से भी कर रहे हैं।

       प्रदेश सरकार के कामकाज से नाखुश तो पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत भी दिखायी दे रहे हैं । उनका यह हालिया बयान कि पहले (उत्तर प्रदेश के समय ) बाहर से आकर प्रदेश को लूटते थे अब अपने ही लोग लूट कर यहीं अपने घर भर रहे हैं। मजेदार बात यह है कि उनका यह बयान भी तभी आया जब चर्चाएं त्रिवेंद्र और बलूनी की नाराजगी की चल रही थी। अब इसे क्या माना जाय । जब नेता अपनी ही पार्टी की सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हों तो इसे नेताओं की सरकार के प्रति नाराजगी न माने तो क्या माने । नाराजगी का आलम यह है कि यह केवल बयान तक होती तो चलता परन्तु त्रिवेंद्र तो संसद में प्रदेश में अवैध खनन का मुद्दा उठाने से भी नहीं चूके । अब कहीं ऐसा होता है भला कि अपनी ही प्रदेश सरकार के संसद जैसे विशाल मंच पर छिलके उतार दो । यह नाराजगी तो तब से दिखाई दे रही है। 

        पारटी के कतिपय नेताओं के निशाने पर प्रदेश सरकार के मुखिया हैं । यह बात खुलकर न सही परन्तु पार्टी के भीतर सभी जानते हैं। और राजनीति मे ऐसा चलता रहता है। भारतीय जनता पारटी को तो इसका कुछ ज्यादा ही अनुभव है। अब तक कांग्रेस पार्टी से अधिक सत्ता में रहने के बाबजूद उसका एक भी मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया । केवल कांग्रेस के एन० डी० तिवारी के नाम ही पांच साल और पांच दिन के कार्यकाल का रिकॉर्ड खिताब है। अन्य मुख्यमन्त्रियो की तो पार्टी वाले ही टांग खींचते रहे जिससे अब तक के अन्य अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये । इनमें भुवन चन्द्र खण्डूड़ी जैसे मुख्यमंत्री भी हैं जिनकी ईमानदारी की प्रायः चर्चाएं होती थी। तो पार्टी के अनुभव को देखते हुए यदि वर्तमान मुख्यमन्त्री धामी अपनी कुर्सी बचा लेते हैं तो यह उनकी बड़ी कामयाबी होगी । वैसे पार्टी के अन्दर सबसे लम्बे समय तक (दोनों परियों को मिलाकर ) मुख्यमन्त्री रहने का रिकॉर्ड तो वे अपने नाम कर ही चुके हैं। 

      अब ऐसा नहीं है कि प्रदेश सरकार के मुखिया अपनी कुर्सी के आसन्न संकट को भांप ही न पाये हों । इसे भांपते हुए ही उन्होंने मन्त्री मंडल विस्तार का ऐसा तीर छोड़ा है जिसमें उनके विरोधी चित नजर आ रहे हैं। विधायकों की अब तक सरकार से नाराजगी इसी बात से थी कि पांच मन्त्रियों के पद खाली होने के बाद भी इन्हें भरा नहीं जा रहा है। मुखिया इस बात को अच्छी तरह समझते थे इसलिये वे अब तक सही समय का इन्तजार कर रहे थे। उन्होंने अपने इस तुरुप के पत्ते को आखिर इसी समय क्यों खोल है ? बताते हैं कि कल रविवार के दिन इस सिलसिले में कई विधायकों ने उसे शिष्टाचार भेंट की है। स्वयं मुख्यमन्त्री पुष्कर सिंह धामी स्वीकार करने लगे हैं कि मन्त्री मंडल विस्तार की उनकी हाई कमान से वार्ता चल रही है। अब जानकार इसे इसी बात से जोड़कर देख रहे हैं कि कुर्सी के खिलाफ चल रही मुहिम को झटका देने के लिये ही इस समय सरकार के मुखिया ने मन्त्री मंडल विस्तार का दांव चला है। 

      अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमन्त्री धामी अपना कार्यकाल पूरा कर पाते हैं या पारटी के अन्दर अस्तुष्ट धड़े की साजिशों का शिकार होते हैं। अगर वह अपना पांच साल कार्यकाल  पूरा कर पाते हैं तो उनके लिये यह बड़ी कामयाब होगी । प्रदेश के हालात और असन्तुष्ट पार्टी नेताओं की सक्रियता देखते हुए अभी यह कहना जल्दवाजी होगा कि धामी के साथ ही प्रदेश का भविष्य किस ओर करवट बदलेगा ।

 = बिमल नेगी    

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