तन्नि तान तन्नि तून, तन्नि ड्यबरि तन्नि ऊन
पंचायती संस्थाओं के क्षरण और राजनीति के पतन की पराकाष्ठा दिखी इन चुनावों में

पौड़ी । तन्नि तान तन्नि तून, तन्नि ड्यबरि तन्नि ऊन । गढ़वाली की यह कहावत हमारे आज सम्पन्न पंचायती चुनावों पर सटीक बैठती है। आज के इस दौर में वैसे ही हमारे जीत के आये अधिसंख्य प्रतिनिधि, वैसे ही ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायतों के चुनाव लड़ रहे ज्यादातर प्रत्याशी, वैसे ही हमारे प्रतिनिधित्व करने वाले ठुले नेता और वैसी ही हमारी सरकार । इन सब की जुगलबन्दी से पंचायतों में जो धनबल और बाहुबल का खेला हुआ आखिर उसे रोकता भी तो कौन ? ऐसे में इस दौर में पंचायती संस्थाओं का क्षरण और राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा तो सामने आनी ही थी ।
आज दोपहर पौड़ी में करीब 20 से 30 कारों का एक काफिला आता है । एक -एक कर उनसे उतर कर जिला पंचायत के नव निर्वाचित सदस्य धीरे – धीरे जिला पंचायत कैंपस की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं और जिला पंचायत के कैम्पस में ही हेडमास्टर की तरह नाम पुकार कर पंचायत सदस्यों को वोट देने से पहले बाकायदा लाइन में खड़ा किया जाता है । हम यह भी कह सकते हैं जैसे गडरिया अपनी बकरियों को गिनता है । हद तो तब हो गयी जब कैम्पस के अन्दर से चुनाव पर्यवेक्षक व डीएम साहिबा के सामने माइक पर घोषणा चल रही है कि चुनाव बिल्कुल पारदर्शी तरीके से कराये जाने के इन्तजाम हैं और बाहर वह पारदर्शी तरीके में सहमे से दिखाई देते वोटर अपने हाथों में अपने वोटर / जिला पंचायत सदस्य होने का पट्टा थामे हैं। आखिर यह किसकी समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसा क्यों और किसकी शह पर हो रहा है। ये सभी वोटर, वोटर की तरह आते और चुपचाप वोट देकर चले जाते परन्तु यह तो पारदर्शी तरीका नहीं होता । हमें तो वोटर की गिनती से ही पार तक दर्शन करने का यह तरीका अच्छी तरह समझ में आया है । इस पार तक के दर्शन के लिये तो हमें अपने प्रतिनिधि नेताओं का शुक्रगुजार होना ही पड़ेगा।
उत्तराखण्ड के ये पंचायत चुनाव इस बार कई मुद्दों को लेकर विवादास्पद रहे। सरकारी आदेशों से उपजे विवाद की बातें तो पहले हो चुकी हैं, यहाँ तो केवल ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव की बातें हो रही हैं। नैनीताल में वोटरों को अगुआ किये जाने और उनके परिवारजनों को धमकाये जाने की बातें और बेताल घाट में प्रमुख चुनाव में गोलियां चलने की बातों ने उत्तराखण्ड में राजनीतिक पतन की पराकाष्ठा के सबूत दिये हैं।
उत्तराखण्ड राज्य के गठन से ही पंचायत चुनावों में शराब से लेकर धनबल का बोलवाला चलता आया है लेकिन तब यह अधिकांश लुके छिपे तरीके से ही होता था। गुण्डागर्दी जिसे अब मर्यादित शब्द में बाहुबल का नाम दिया गया है उसे कहीं नहीं देखा जाता था । लेकिन अब उत्तराखण्ड के पंचायत चुनाव मे खासकर ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में जिस तरह यह धनबल और बाहुबल की नुमाइश खुले दौर पर की जा रही है वह उत्तराखण्डी समाज व राजनीति के लिये दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रत्याशी व उसके समर्थक इस दिखावे व प्रदर्शन को भी अपनी जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं। यह बात पहले बिल्कुल गोपनीय रहती थी कि कंडीडेट ने वोटर को कहाँ छुपाया है और अब वे स्वयं ही उजागर करने पर लगे हैं कि फलां होटल में फलां जगह हैं और इतने कब्जे में हैं। मेरे ऐसे ही एक कब्जे में रहने वाले वोटर से बात हुई तो उसने बताया कि मजे में हैं लेकिन नजर में हैं। और अब पाले में हैं तो पाले में ही रहना पड़ेगा ।
अब तो नतीजा भी इन वोटर्स को कब्जाने की स्थिति के कारण पहले ही आम जनता तक पहुंच जा रहे हैं । चुनाव तो मात्र औपचारिकता बन के रह गया है। अब इन वोटर्स पर खुल कर धन खर्च करने वाले कुर्सी पर बैठकर धन कमाने के रास्ते तो तलाशेंगे ही । फिर चाहे उन्हें कोई सिंडीकेट बना कर ही न तलाशने पड़ें। वे चुप बैठने से तो रहे । और अब यहीं से शुरू होती है पंचायत राज संस्थाओं के क्षरण की शुरुआत । जो पिछले चुनाव के बाद कुछ – कुछ दिखाई दी थी और जिसके अब खुलकर दिखाई देने के लक्षण नजर आ रहे हैं।
पंचायत संस्थाओं से मतलब तिस्तरीय पंचायतों से है । जिसमें ग्रामसभाएं भी हैं। विकास क्षेत्र भी हैं और जिला पंचायते भी हैं। अब जिस ढंग से चुनावों मै प्रत्याशी खुलकर खर्चा कर रहे हैं तो जीतने के बाद ऐसे प्रत्याशियों की नैतिकता तो चुनाव का खर्चा गिरवी रख देता है। जब जीतने वाला जनसेवा की बात न कर कमाने की बात करने लगे तो यहीं से पंचायती संस्थाओं के क्षरण का सिलसिला शुरू होता है। गाँव से लेकर जिले तक की जनता इन प्रतिनिधियों से प्रायः असन्तुष्ट इसीलिये रहती है । आम जनता की पता ही नहीं चलता कि सरकार कितना पैसा पंचायतों को दे रही है और उसे कहाँ और किस तरह खर्च किया जा रहा है।
पौडी जिला पंचायत का पिछला कार्यकाल सबके सामने है जिसमें घोटले दर घोटाले पकड़ में आते रहे और जांच पर जांच होती रही परन्तु एक दो कर्मियों पर गाज गिरने के अलावा कुछ हुआ नहीं। पिछले कार्यकाल में उपाध्यक्ष रही इस बार अध्यक्ष बन चुकी हैं। अब इस बार क्या होगा? यह भविष्य के गर्त में है ।
वर्तमान समय सरकार को इन चुनावों के बारे में गंभीरता से सोचने का है। इस तरह खुला खेल मुरादाबादी चलने से हमारे नेतागण / प्रतिनिधि भ्रष्टचार की दलदल में फंसते जा रहे हैं । आम आदमी हताशा से उनकी ओर देख रहा है और वे लोकतन्त्र की कब्र खोदने पर लगे हैं। ब्लाक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का जनता के बीच सीधे मतदान से चयन हो तो खरीदने – बिकने के इस फलसफे पर कुछ तो अंकुश लगाया जा सकता है। लेकिन सवाल यही हैं कि बिल्ली के गले में घण्टी कौन बांधेगा । सतपाल महाराज कहते रहें, हमारे नेता तो अपनी ही स्वार्थी सियासत में मस्त रहेंगे। जनता से उन्हें क्या लेना – देना ।


