तीन दशक बाद भी मुज्जफर नगर काण्ड के पीड़ितों को न्याय नहीं ।
हाई कोर्ट का उत्तर प्रदेश सरकार को दो सप्ताह में जबाब दाखिल करने के आदेश

उत्तराखण्ड आन्दोलन के लगभग 31 साल गुजरने वाले हैं लेकिन न्याय की आस में पीड़ितों की आँखें पथरा गयी हैं। मुज़फ्फरनगर में रामपुर तिराहे काण्ड के तीन दशक बाद भी केवल एक मामले में आंशिक न्याय मिला है। अन्य मामलों के बारे में स्वयं उच्च न्यायालय और याचिकाकर्ताओं को भी मालूम नहीं कि उनमें क्या प्रगति है। उच्च न्यायालय में सुनवाई के बाद अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को दो सप्ताह के भीतर जबाब दाखिल करने को कहा है।
इस मामले में न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा कि जो छह मामले दर्ज हुए थे, वे किस कोर्ट में चल रहे हैं। उनकी क्या स्थिति है।
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि जब से मुकदमे दर्ज हुए हैं, उन पर कोई सुनवाई नहीं हो रही है। 30 साल बीत गए, उनकी क्या स्थिति है कुछ पता नहीं है। छह मुकदमे जिला जज ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के एक पत्र पर मुज्जफरनगर कोर्ट में सुनवाई के लिए भेज दिए। तब से इन पर कोई सुनवाई नहीं हो पा रही है। मांग की गई कि इन पर शीघ्र सुनवाई की जाए ।
राज्य आंदोलनकारी के अधिवक्ता रमन शाह ने बताया कि इस मामले में सात महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुआ था जबकि 17 अन्य को प्रताड़ित किया गया था। मुख्य आरोपी मुज्जफरनगर के तत्कालीन जिलाधिकारी अनंत कुमार सिंह तथा सात अन्य आरोपितों के मामले सीबीआई की ओर से मुज्जफरनगर कोर्ट को स्थानांतरित कर दिए गए थे। इनकी सुनवाई अब तक लंबित है। राज्य आंदोलनकारियों की सुप्रीम कोर्ट में अपील पर मामला नैनीताल हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया था।
गौरतलब है कि मुजफ्फरनगर काण्ड के केवल एक मामले में ही सत्र न्यायाधीश कोर्ट न ० 7 विशेष न्यायाधीश (सी बी आई ) मुज्जफरनगर की अदालत से एक फैसला सुनाया गया है । जिसमें इस बर्बर काण्ड में शामिल दो पीएसी पुलिस कर्मियों मिलाप सिंह और वीरेन्द्र प्रताप को उम्रकैद और 50 – 50 हजार जुर्माने की सजा सुनायी गयी है। इतने बड़े और अभूतपूर्व कांड में केवल ये दो पुलिसकर्मी बलात्कारी नहीं थे। सीबीआई जांच में उत्तराखण्ड मूल के दो पुलिसकर्मी भी आरोपी थे जिन्हें राज्य के गठन के बाद सजा मिलने के बजाय तरक्कियां मिलती गईं। इस मामले में आरोपी कतिपय पुलिस कर्मियों की मृत्यु भी हो चुकी है।

अफसोस इस बात का है कि तीन दशक गुजरने के बाद भी अभी तक पूर्ण न्याय मिलने की उम्मीद नहीं बन पायी है। जबकि उत्तरप्रदेश और उत्तराखण्ड दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। माना कि मामला अदालत में है और सीबीआई इन मामलों में जांच ऐजेन्सी है लेकिन मामले में तेजी लाने का दबाब तो केन्द्र सरकार से बना ही सकती है । उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारियों को भी इस मामले में संगठित रूप से आगे आना होगा तभी पूर्ण न्याय की उम्मीद की जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि 2 अक्तूबर 1994 को पृथक राज्य की मांग पर प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों पर मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर पुलिस की ओर से अत्याचार किया गया। महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म किया गया। कई आंदोलनकारियों की मृत्यु हो गई। कोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। अनंत कुमार पर राज्यपाल की ओर से मुकदमे की अनुमति न मिलने से उन्हें छूट मिल गई। सीबीआई ने घातक हथियारों से हत्याएं करने और फायरिंग से गंभीर चोट पहुंचाने आदि धाराओं में मामले दर्ज किए। इस मामले में सुनवाई विभिन्न कारणों से लंबित ही रही
1996 में सीबीआई ने तत्कालीन जिलाधिकारी मुजफ्फरनगर अनंत कुमार सिंह समेत अन्य के खिलाफ विभिन्न धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी। इसके खिलाफ 2003 में अनंत कुमार सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
कोर्ट ने उनको राहत देते हुए मामले पर रोक लगा दी थी। 22 अगस्त 2003 को हाईकोर्ट की एकलपीठ ने अपने फैसले को रिकॉल कर लिया था। फिर मामले में सुनवाई नहीं हो सकी तो मामले से जुड़ी फाइल भी गायब हो गई। याचिका में कहा गया कि मामले से जुड़ी फाइल गायब करने वाले लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई हो।
दरअसल 2 अक्तूबर 1994 के मुजफ्फरनगर काण्ड के सिलसिले में मसूरी की उत्तराखण्ड संघर्ष समिति की ओर से याचिकाकर्ता- सुधीर थपलियाल, जोत सिंह एवं देवराज कपूर द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 7 अक्टूवर 1994 को न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि एस. धवन एवं न्यायमूर्ति ए.बी.श्रीवास्तव की बेंच में याचिका दायर की थी। इस याचिका पर इलाहाबाद हाइकोर्ट ने पुलिस दमन को राज्य प्रायोजित आतंकवाद बताया था।
कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए सीबीआई को आदेश जारी किए थे और सीबीआई ने सम्पूर्ण उत्तराखण्ड आन्दोलन में पुलिस दमन की जांच कर अपनी रिपोर्ट कई खण्डों में अदालत में दाखिल की थी।
बरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत की एक पुस्तक ‘‘उत्तराखण्ड का नवीन राजनीतिक इतिहास’’ में इसका पूरा विवरण दिया गया है।
अपनी इस किताब में बरिष्ठ पत्रकार जय सिह रावत ने लिखा है कि सीबीआई की पहली रिपोर्ट के पृष्ठ 22 से लेकर 27 तक में बलात्कार एवं लज्जाभंग और छेड़छाड़ का विवरण दिया गया है। इसके समर्थन में संलग्नक भी दिए गए हैं। प्रथम रिपोर्ट के साथ लगे संलग्नक 6 भागों में तथा 391 पृष्ठों में हैं। इसके भाग तीन में गवाहों के बयान दर्ज हैं। इस रिपोर्ट के भाग तीन में बलात्कार एवं लज्जाभंग की शिकार महिलाओं और प्रत्यक्ष दर्शियों के बयान शामिल है। जिन महिलाओं के साथ बलात्कार एवं लज्जाभंग हुई थी उन्होंने जांचकर्ताओं से निवेदन किया कि लोकलाज के डर से वे अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहती हैं।
उनका यह भी कहना था कि उन्होंने घटना वाली रात के अपने वस्त्र वहीं कहीं फेंक दिए थे। उन्होंने इस मामले का ट्रायल भी सार्वजनिक तौर पर करने के बजाय कैमरे (बन्द कमरे ) में करने का अनुरोध किया और अदालत भी यह उचित नहीं समझती कि उन बलात्कार की शिकार महिलाओं और गवाहों के नाम सार्वजनिक हों। बसों और गन्ने के खेतों में लूटीं महिलाओं की अस्मत उस रात पुलिस के बहसीपन पर सीबीआई द्वारा अपनी रिपोर्ट में दिए गए विवरण का एक छोटा सा अंश इस प्रकार हैः-
‘‘…इन बसों से यात्रा कर रहीं 17 आन्दोलनकारी महिलाओं ने आरोप लगाया कि उस रात पुलिसकर्मियों ने लाठी चार्ज करने के बाद उनसे छेड़छाड़ की और बड़ी संख्या में आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। लाठीचार्ज के बाद रैली वाले इधर-उधर तितर वितर हो गए थे। कुछ महिलाओं ने बताया कि कुछ पुलिसकर्मियों ने बसों में चढ़ कर महिलाओं से छेड़छाड़ की। कुछ ने कहा कि उनके साथ पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार किया गया। इनमें से 3 महिलाओं ने कहा कि उनके साथ बसों के अन्दर ही बलात्कार किया गया, जबकि 4 अन्य का आरोप था कि उन्हें बसों से खींच कर नजदीक गन्ने के खेतों में ले जाया गया और वहां बलात्कार किया गया। ये सारी वारदातें मध्य रात्रि 12 बजे से लेकर 2 अक्तूबर सुबह 3 बजे के बीच हुईं।
( अस्वीकरण – उक्त विवरण उक्त पुस्तक के आधार पर है। लेखक का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं )



