माणापाथाकरण (मानकीकरण) बादमा पैलि गढ़वाळि लिखण – पढ़ण सिखावा
अपड़ा छन केदारी (गढ़वळि भाषा) तैं भेळुंद लमडाणा

लिख्वार : अबोध बन्धु बहुगुणा
भई गढ़वाळि मठु-मठु कैकी ऐंच, मथि डांउ जिनां सरकणी छ अर कुछ छेतरी छुयांळ, निमखणि मगजौ, जड़कट्वा, फुंडध्वळ्यां एक हैंकाक डौणी खैंची बेड़ ल्हसरणा बिसे जांदन। जरा या गढ़वाळि घुंडमुंड लछेकी ग्वायी लगाणी च त कुछ लमडेर यीं बिगरैली, गुणी बनि-बनीक लब्जुं की खांडि, भौ-भौं किस्मा की बोली बोलण वळी यीं केदारी तैं भेळुंद लमडाणौ जंक-जोड़ करणा छन।
जरा यीं गढ़वळि की बुग्याळ मा बिगळ्यां-बिगळ्यां भौणीक फूल लगणा छया पण यूॅं सणि फूल भला नी लगीन अर ले यीं होणत्यारी बग्वाळमा जोळ लगाणै पवांण लगण बिसे ग्ये। अबि यीं की कुंगळी-कुंगळी पाती तलक आयी नीन कि बल यी पर्वाण दाथी, थमाळी, कुलाड़ी, बसूला, आरी लेकी ऐ गेन। बळ यीं डाली की “कटिंग-सेटिंग” करे जाण चयांद। अबि तलक छंदेळी, रस्याणी केदारी इथगा बड़ी होयी नी छ कि या कटोरी क छणटणाट सूणी सौक अर हमारा कुछ जागरी यीं कुंगळि-कुंगळि नौनी का सामणी कैंतुरा का झस्कण्या घड्यळ धरणा छन।
जी हां, माई फ्रेंड्स ! मी जरा फक्वा छौं त सै बात करणू छौं। निथर हमारा गढ़वाळ्यूं अर खासकै लिखंदेड़ौं का जथैं-कथैं यी हाल छन।
अमणी गढ़वाळि कि असलि समस्यौ पर बात नि कैरि कि हमरा कुछ दगड्या आन्दोलन चलाणा छन माणापाथीकरण का। इथै गढ़वळि फर हिन्दीयण्या रोग सौर्यूं छ अर हमारा डागधर स्टैंडर्डाइजेशन का इंजेक्सन की स्यूंण खुज्याण छन। हां हे गैल्यो झूठ बोलणो हो त बोल्यान। आज गढ़वळि की समस्या अपड़ी पछ्यांणक बचाणै छ। हमारा कणसा से लेकी ठुल्ला लिख्वार-गितार हिन्दी का लब्जुं तैं कुचेकी गढ़वळि को भतियाभंग करना छना कति लेखूंमां गढ़वळि आप इनी बिंओरी सकदवां जन बल चौंळूक थुपड़ी मांगन लुब्या बिंओरी ल्याओ। जख हम गढ़वळिसणि ठेट गढ़वळि रखणै आंदोलन चलाण चयेणौ थौ उथैं हम टिर्याळी अर सिरीनगर्या की दुपाल्टीमा जुत्यौ करणमा लग्यां छवां। ए भै जथगा मगज ये मानकीकरण का पैथर खपाणा छौवां उथगा मगज हम गढ़वळि लफज खुज्याणौ, समळौणौमा लगांद त् गढ़वळि को कुछ भलो ले होंदु धौ। ठेट गढ़वळि तैं मानकीकरण लमडाणू छ। आज जथैं टिहरी का प्रताप शिखर अर समोदर का छाल फर बैठ्यां सलाणी कुकरेतीमा यानि चिट्ठी चलण चयाणी थै बल यीं गढ़वळि बांद तैं क्वा क्वा जर जवोर पैरये जावु कि या बांद दनकणी बिसे जावु, वख यूं दुयूंमा मानकीकरण को जुद ज्वड्यूं छ। इनमा त मी यी बोली सकदू बल द्वी सांडू की लड़ैमा त नुकसान पुंगड़ौ को ही होण, नि बोली जाण।
जख आजै गढ़वळी का सम्यणी भौत बड़ी आफत या अयीं छ बल हम तैं गढ़वळि पठंदेर कूंण्या.. कूंण्या हिरण पर बि नि मिलणा छन अर हम माणापाथीकरण का मुछ्यळा लेकी गढ़वळि पैथर पड्यां छवां। आज त गढ़वळि की चौक, तिवारी,डंडेळी,मांगल लगण चयांणा छया,छ्वीं होणी थैं कनै गढ़वळि पठंदेरु तै इकबटोळ करे जावु, कनै इन बाटु बणये जावु कि गढ़वळि किताब पढ़नौं ढब (याने एडिक्ट) दिये जावु जांसे गढ़वळि कु छुप्यूं साहित्य अग्वाड़ी चौखम्बा से बि ऐंच ह्वे जावु। पण हम गढ़वळ्यूं का त पिछ्ल्वाड़ी बाड़ी जि खयूं छ। ऐन बगत फर मत मारें जांद हम कुजगामा कुबकतां अगा या पछा फसल बोण बिसे जांदवां।
आज जख हम तै इन ब्योंत खुज्याण कि हिलांस, गरजते स्वर, धाद, अलकनन्दा, बुग्याळ जनि पत्रिका बचीं रावन जां से बल गढ़वळि छपे जावु, जां से पाठक तैयार होवन वख हम मानकीकरण की तोप पैन्नाणा छवां अरे यूं गढ़वळि खैरख्वाहों जू यूं पत्रिको तैं छापणा छन वूं सणि पूछा त सै कि कनै यी पत्रिका छापणा छन। आज त यूं पत्रिकौं की गाहगी कनै बढ़ये जावु वांकी छ्वी लगण चयाणी छै त हम मानकीकरण होळ-ज्यू सजाणा छवां।
आज चालीस लाख गढ़वळि मवासा होला अर यूं सात लाख गढ़वळि मवासौं मांदे दस हजार मवासा इन त् छैं इ छन जु पच्चीस रुप्या हर मैना की गढ़वळि किताब मुल्येकी पढ़ी सकदन,याने गढ़वळि साहित्य का वास्ता हर मैना द्वी लाख पच्चास हजार रुप्या कट्ठा ह्वे सकदु। मतलब साल भरमा तीस लाख रुप्या गढवळि साहित्य पर लगी सकुदु। आज त् लिख्वारूं तैं गढ़वळ्यूं तैं यी सिखाण चयांद कि हर मैना पचीस रुप्यां लगवो वख हम मानकीकरणमा अटक्यां छवां। जरा इन गीत ल्याखो, इन धै लागवो, इन रैबार पावो कि साल भरमा गढ़वळि साहित्य का वास्ता तीस लाख रुप्या नियोजित ह्वे जावो। पण हमारी आदत त बाटु छौड़ीक भेळ पड़ना की जि ह्वे ग्ये।
अर म्येरो रैबार बि सूणी ल्यावा कि जू यू मानकीकरण को जुद्ध जुड़ाणी आयी त अब हम सलाणी बि कुरुक्षेत्रामा ऐ जांदवा। उनि बि जब कुछ काम नी छ अर गौड़ी क कांध मलासी ल्यूंद। त् मेरी धै, रैबार यो छ कि असली गढ़वळि त सलाणी इ छ। यी मि नी छौं बोलणू- यी लफज छनां पहाड़ी जी का। वूंको बोलण् छ बल सलाणी संस्कृत से पैल्याकी बोली छ। अर सलाणी का फील्ड मार्सल भी पूरन पंत तैं घोषित करी लींदू अर जनरल राला अपणा मन्यारी गुसैं जी, ढौंडियाल जी, नैथानी जी, धूलियाजी, बिनोद उनियाल जी, ईश्वरी उनियाल जी, श्री घिल्डियाल जी, नागेन्द्र उनियाल जी, नेत्रा सिंहजी, केशवान जी, कन्हैयालाल जी, नवनी जी, सुरेन्द्र खुशहाल ‘सायर‘, तोता रामजी, बडोला जी, नेगी जी अर सेना का लेफ्टीनेंट कैप्टेनूं की त पंगत लगीं छ, अब जरा धड़यावदी ये मानकीकरण का कुरुक्षेत्रा। अब जो सलाण बि तोप, बंदूक,बर्छा, छुर्रा, खुकरी लेकी टिर्याळी अर सिरीनगर्या बोलीं क पैथर पोड़ी जाला त अणभर्वस कैकू होणु ? गढ़वळि को ही ट्वाटा होण। त् किलै अबि बिटने ये पचड़ा मा पड़े जावु जांसे गढ़वळि को छत्यानास इ होण।
असलमा आज त् आंदोलन गढ़वळि पठदेरूं तै बढ़ाणै क चलण चयांद। आज आंदोलन होण चयांद कि गढ़वालमा गढ़वाली पढ़ए बि जावु अर यां सि खास कि भेर तब हमारा जथगा लोग छन ऊं सब्यों तैं गढ़वळि अपनाईं चयांद अर व्यवहारमा लायीं चयांद तब्बि गढ़वळि कु भलु ह्वे सकदो नथर फिजूल की बहसमा अलझौण से हमन बि अलजी जाण अर भाष मा जो थोड़ भौत लिखेणू बि च वेन बि बुसे जाण !
(एक कौंळि किरण बटी )
दिनांक : 15 सितम्बर, 2025



