लोक भाषा

जन मयेड़ी बल तनी जयेड़ी

गढ़वाळि ननि कथा

गढ़वाळि ननि कथा

कथाकार : बलबीर राणा ‘ अडिग’

ब्वेकु बैं हाथन् पाँचेक् सालै श्रेया कु बस्ता छौ कांधिम थाम्यूं । दैणा हाथन् वींकि श्रेया कि हथगुळि छै पकड़ीं । ब्वे खखोड़ी छै वींतैं अग्नै खैंचणि । श्रेया खुनखुन करि पिछनै छै ताण मारणी। वींकु हैंकि तरफां ताण मन्नो कारण छौ इस्कोला गेटा बैं तरफां बाळों कि चटण-बटण वळि दुकनि।

चुप्प रा गौ खड्यौण्यां, चल अग्नै ? मैने तेरो को फुंड चुट्याणा आज।

वीन खुन्न-खुनाट दगड़ बोलि “अपणि बाबै सै……. होगी तू ” मुझे चौकलेट नै लाणै देती है। ब्वेल चट्टाक वींका गिच्चा पर धारी एक चपकताळ। कैसी गळद्यवा लड़की है ये ? पता नै काँ-काँ से सीखती है ऐसी भद्दी गाळयां। यां सैर-बजार में रै कर तमीज बि नै सीख रयी। जनु कि सैर-बजार होन्दू ही तमीजा वास्ता होलू।

चल घर, तेरे पापा को तेरी सिखैत करूंगी आज।

ऊँऽऽ..हुँ…हुँ, हाँ…. कल देणा, उस पापा ने ही दिले थे मुझे पांच लुप्या, ऊँऽऽ हुँ.. हुँ ।

अच्छा त सु कमिना बिगाड़ रा मेरी श्रेया को, बतौन्दि वेतैं आज ।

‘जन मयेड़ि तनि जयेड़ि’ श्रेया कख चुप्प रौण वळि छै। वीन बि टप्प उनि खुन-खुनाट दगड़ ऊँऽऽ..ऊँऽ… मैने बि बता देणा कि पापा ये मम्मी तुझे कमिना बोल रयी थी अर ब्याळि बगल वाले अंकल को “अपणि मयेड़ी ख… स…..” बोल रयी थी।

मि वूंका पिछनै-पिछनै छौ औणू तै पतळी गळि मा। तौंकि विशुद्ध लोकवाणि वार्ता सूणि मितैं खित्त हैंसि ऐन अर मि तौं तैं बिरै अग्नै सरक्यूं।

मेरा अग्नै सरकण पर स्या भुलि गुणमुणाट करी छै बुन्नी, ‘आँ… ऐसे हंसणें वाले तो देते हैं बच्चों को कुशिक्षा’ ।

 ++——-++

दिनांक : 19 सितम्बर, 2025

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button